Short Stories

बाप की तलैया

लालाराम तलैया में बैठा पानी पी रहा था। जेठ की गर्मी में उसका जल सूखा गया था। थोड़ा-बहुत गंदा पनी बचा था। लाला राम उसी में से साफ पानी लेने की कोशिश कर रहा था। मार्ग से गुजरते एक पथिक से न रहा गया। उसने कहा कि कुछ दूर पर जो कुंआ है, वहां स्वच्छ पानी हे, वहाँ जाकर क्यों नही पीते?  यह पानी गंदा है इसे क्यों पीते हो। लालाराम का जवाब था,   “यह मेरे पिता की तलैया है,   इसी का पानी वे पीते थे,  इसी का मैं पीऊँगा।” हमारे बीच भी लालारामों की कमी नही हैं। हम स्वयं अंधविष्वासों से इतने जकडे हुए हैं कि पूर्वाग्रह को छोड़ सत्य को अपना नहीं पाते, पकड़ नहीं पाते।

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