Short Stories

प्रायश्चित

सागर (म. प्र.) में उनको आवश्यकता थी ईंधन की। तभी देखा एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी लकड़ी भरी बैलगाड़ी ला रहा है। भाव तय हुआ और गाड़ी खाली होनी शुरु हो गई। तभी युवक की धर्म माता उधर आई। भाव सुनकर बोली, बेटा दाम अधिक लगता है, इस गाड़ीवान ने तुम्हें ठग लिया।

युवक को मन में झुंझलाहट हुई। सोचा, इस बूढ़े से ही वसूल करूँगा पैसे! एक शर्त लगा दी देखो जी! ये लकड़ियां बहुत मोटी हैं, इन्हें चीरकर रखो, वर्ना वापस ले जाओ।

लकड़ी वाले बूढ़े ने सोचा, इतनी मेहनत से तो इन्हें उतार पाया। अब वापस रखना, फिर बेचने जाना कठिन होगा। अतः कुल्हाड़ी लेकर काटने-चीरने लगा। कार्य पूरा करते-करते  पसीने से लथपथ हो गया। मात्र लकड़ी के दाम ले वह थका हारा चला गया। और जब उस युवक ने फिर सोचा, “गलती तो मेरी ही थी। भाव तय करके भी बेचारे बूढ़े आदमी को थकाया, इसका प्रायश्चित करना होगा।”

चिराई के पैसे और एक व्यक्ति लायक भोजन, कुछ मिठाई लेकर धूप में नंगे पैर (पांव) दौड़ पड़ा। और कुछ दूर जाती गाड़ी रुकवाई। गाड़ीवान से बोला – बाबा! मैंने आपको बड़ा कष्ट दिया, आप क्षमा करेंगे और यह ले लीजिए। बूढ़े गाड़ीवान से उसके जीवन में ऐसा  व्यवहार किसी ने नहीं किया था। चकित होकर उसने भोजन, पैसे लिए और छलकती आँखों एवं रुंधे गले से इतना ही बोल पाया “भैया  तुम  तुम!…”

वह नवयुवक थे पूज्य गणेशप्रसाद जी वर्णी। जिन्हें जैन जगत और भारतीय प्रबुद्ध समाज पूज्य वर्णीजी के नाम से जानता है।

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