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उत्तम क्षमा

न कोई मेरा शत्रु है न मित्र, मैं स्वयं वीतरागी ज्ञानी, ज्ञाता-दृष्टा हूँ। मेरे में उत्तम क्षमा सदा ही निवास करती है। न मैं कभी कोई अपराध करता हूँ न दूसरा कोई मेरे साथ अपराध करता है, इसलिए जैसी मेरे में उत्तम क्षमा है, वैसी ही सबमें उत्तम क्षमा है। इस उत्तम क्षमा की सत्ता में द्वेष की जरा भी मात्रा नहीं दिखलाई पड़ती है। इसका रंग सदा ही सुहावना और शुक्ल है-सब जीव मेरे समान हैं। न कोई कम है न कोई अधिक। सब ही असंख्यात प्रदेशी, सब ही ज्ञान सुखादि अनन्त गुणों के धनी, सब ही परमानन्दमय अविनाशी हैं। समता समुद्र में मैं और सब आत्माएं डूब रही हैं। सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय का आभूषण सब ही में शोभायमान है। सब ही त्रिलोक स्वामी हैं। परस्पर क्षमा मांगने की व क्षमा करने की कोई जरूरत नहीं है।

हे उत्तम  क्षमे! तू चिरकाल हमारे हृदय में निवास कर। तेरी मनोहर मूर्ति परम आल्हादकारी और सदा हितकारी है। धन्य हैं वे महात्मा जो तेरा दर्शन नित्य करते हैं, तू मुक्तितिया की परम सखी है।

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