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उपकारी को प्रथम नमस्कार

भैरण्ड पक्षी द्वारा स्वर्णद्वीप में जाने के लिए चारुदत्त का मामा एक बकरे को मार रहा था। बकरे को मरणासन्न देखकर चारुदत्त ने उसे णमोकार मन्त्र सुना दिया। मामा की बातों में आकर चारुदत्त मामा के साथ भैरण्ड पक्षी द्वारा बकरे की खाल में बन्द होने से पशु समझा जाकर स्वर्णद्वीप ले जाया गया। वहाँ उन्हें सौभाग्य से एक जैनमुनि के दर्षन हुए। दोनों वहाँ बैठ गये इतने एक ऋद्धिधारी देव ने आकर सर्वप्रथम चारुदत्त को नमस्कार किया, इसके पश्चात् मुनि को नमस्कार किया। मामा ने इस अविनय का कारण पूछा तो उस देव ने कहा- मैं पूर्व भव में बकरे का जीव था तब इन्होंने मुझे णमोकार मन्त्र सुनाया था। जिसके फलस्वरूप मैं शुभ भावों से मरकर देव हुआ हूँ। अतः ये मेरे परमोपकारी है। क्योंकि  इन्होंने ही मुझे आज उपदेश सुनने योग्य बनाया है।

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