एक त्योहार के दिन सबेरे गाँव के सभी लोग कावेरी नदी में स्नान करने पहुँचे। पं. काँचनशर्मा नदी में स्नान समाप्त करके अपने घर लौट रहा था। तभी माधो अछूत भी सर झुकाये नहाकर चलते हुए उनकी बगल में से गुजरा। तब माधो का गीला वस्त्र काँचनशर्मा को छू गया।

काँचनशर्मा ने गुस्से मे आकर दाँत किटकिटाते माधो को गालियाँ दीं। माधो ने इस बात के लिए माफी माँगी कि धँुधले अंधेरे में न देख सकने के कारण उससे गलती भी हो गयी और उसने साष्टांग दण्डवत भी किया। तब भी काँचनशर्मा का क्रोध शांत न हुआ। उसने माधो के सिर पर चार पाँच लातें मार दीं और अछूतो को छूने के अपराध में फिर नदी में स्नान किया।

काँचनशर्मा को स्नान करते देखा माधो भी फिर नदी में जाकर नहाने लगा। इस पर शर्मा ने माधो से पूछा “अछूत को छूने के कारण मैंने स्नान किया, पर तुम फिर क्यों नहाते हो?”

इस पर माधो ने जवाब दिया- “क्रोध नामक चाण्डाल अछूत एक साधारण अछूत से भी नीच होता है। आप पर क्रोध चाण्डाल सवार था, इसलिए उसके स्पर्श से अपने को पवित्र करने के लिए मैं नहा रहा हूँ।”

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