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त्यागी कौन? सम्राट या सन्त?

एक सम्राट ने सन्त के चरणों में वन्दना करते हुए कहा कि युवावस्था में संसार के सभी भौतिक सुखों का त्याग कर आप तपस्वी जीवन जी रहे हैं, एतएव आप जैसे महान् त्यागी के चरणों में भक्ति वन्दना करता हूँ। तभी संत मंद स्मित के साथ सम्राट को कहते है कि हे राजन! सच्चा त्यागी तो तू है, मुझे तुम्हें नमस्कार करना चाहिये। क्योंकि तू अनन्त आत्मानन्द-आनन्दसागर को छोड़ कर एक बिन्दू के समान विषय सुख में संतोष मान रहा हैं इस विराट आसमान की बादशाही छोड़कर थोड़े से पत्थरों की चार दीवारी ,महल या नगरी या राज्य कहलाने वाली छोटी सी जगह में सन्तोष मान कर बैठा है। सर्वव्यापक आत्मा का घर छोड़ कर दुर्गंधी व विनाशी छोटे से शरीर में रहना एवं गटर जैसे शरीर की मालिकी में संतोष स्वीकार किया है अतएव तू ही सच्चा त्यागी है।

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