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वस्तु विज्ञान ही सच्चा त्याग है

छात्रावस्था में विद्यालय की ओर से एक नदी के किनारे सहभोज था। वह नदी छोटी थी किन्तु रेत बहुत थी। उस रेत में चमकीले पत्थर बहुत थे मैं तो जैसे निधि पा गया था। शाम तक ये सुन्दर रंगीन चमकीले पत्थर इतने इकट्ठे कर लियें कि उन्हें साथ लाना असंभव था। चलते समय उन्हें छोड़ना पड़ा तो आँखें रो पड़ीं। मुझे रुँआसा देख कुछ लोग हंस रहे थे। जिन्होंने उन पत्थरों से कोई लगाव नहीं था, मुझे वे त्यागी लगे। पत्थरों का पत्थर जान लेना ही त्याग है। वस्तु तो स्व से छूटी ही है। उसको छूटी जान लेना सम्यग्ज्ञान है, सच्चा त्याग है।

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