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सत्य का प्रभाव

पुराने समय मे एक खूंखार भयंकर डाकू था। वह लोगों को मारता, लूटता, डाके डालता और उनका धन लेता था। एक समय वह एक साधु से ही कुछ मांगने लगा, तो महाराज ने पूछा – तुम जो लूट के धन लाते हो उसे तुम्हारे सारे परिवार के लोग खाते हैं उससे तुम्हें जो पाप लगता है उसके पाप मंे भी तुम्हारे परिवार के सदस्य क्या हिस्सा लेंगे? तुम घर से पूछना। डाकू घर गया और उसने सबसे पूछा कि तुम भी मेरे पाप के भागी बनोगे। सब ने मना कर दिया।
उसने साधु से कहा – स्वामिन्! मेरा डाका डालना नहीं छूट सकता इसलिए पाप कम करने के लिए क्या करुं?
साधु ने कहा – कि तुम जो झूठ बोलकर पाप को बढ़ाते हो उस पाप को घटाने के लिए झूठ बोलना छोड़ दो। उसने झूठ बोलना छोड़ दिया। अगले दिन वह रात्रि को राजमहल चोरी करने को गया।
पहरेदार ने पूछा – कहां जा रहे हो?
जवाब मिला – डाका डालने के लिए। पहरेदार ने मजाक समझ कर जाने दिया। जब वह संदूक लिए बाहर निकला तो पहरेदार ने पूछा किस चीज का सन्दुक ले जा रहे हो?
हीरे का।
पहरेदार ने कहा – किस से पूछ क?
डाकू ने कह – डाका डालकर।
पहरेदार ने कहा – चिड़ते क्यों हो, जाओ। सुबह हुआ तब पता चला कि हीरे का सन्दूक गायब है। तब पहरेदार ने रात की सारी घटना राजा को सुनाई। राजा ने डाकू का पता लगाकर उसकी सच्चाई से खुश होकर उसे जिन्दगी भर के लिए खर्च दे दिया और उसे नौकरी भी दे दी। जब डाकू के पास धन हो गया तो उसने डाकें डालने की आदत छोड़ दी और वह साधु बन गया ।

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