महाराज युधिष्ठिर के पास किसी याचक ने आकर कुछ मांगा। युधिष्ठिर को वह मनुष्य अच्छा दिखलाई पड़ा, अतएव युधिष्ठिर ने कल का वादा किया तो भीम ने सोचा कि बड़े भैया दान की भूमिका भूल गये हैं। कुछ कहूंगा  तो बुरा लगेगा। लेकिन मुझे अपने बड़े भाई का हित करना है तो मैं क्या करूं? ऐसा विचार करके चौक में रखे नगाड़े को बजाने लगे।

धर्मराज ने पुछवाया – यह नगाड़ा क्यों बज रहा है? भीम ने कहा – भैया ने काल को जीत लिया है, इसी खुशी में क्योकि उन्होंने एक याचक को कल दान देने का वादा किया है। अतएव कल तक के लिए तो उन्होंने काल को अपने आधीन कर लिया है। इस बात को सुनकर युधिष्ठिर लज्जित हुए। मैंने यह भूल की है, जो सुपात्र को तुरन्त दान नहीं दिया। कल का क्या भरोसा? अच्छे कारियों को कल के ऊपर कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ऐसा विचार कर उस पात्र को दान देने के लिये बुलवाया। सेवक ढूंढकर लाये और युधिष्ठर ने सम्मानपूर्वक दान दिया।

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