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तनाव रहित जीवन के सूत्र

तनाव (Tension) – भय, चिन्ता, दबाव अथवा कार्य को शीघ्रता से पूर्ण करने की बाध्यता/इच्छाजनित एक विशिष्ट शारीरिक मानसिक स्थिति है, जिसमें रक्त परिवहन गति असामान्य हो जाती है तथा व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, सिरदर्द, अवसाद, एकाग्रता की कमी आदि लक्षण दृष्टि गोचर होते हैं।

आधुनिक जीवन शैली तनावों को बढ़ाती है। अध्ययन, व्यवसाय व नौकरी की प्रतिर्स्पद्धा, अन्य से आगे बढ़ने की इच्छा व सफलता की भूख, असफलता का भय तनावों को बढ़ा देता है। आधुनिक भौतिकवादी विचार धारा व भोजनपान की आदतें शरीर व मन की तनाव को सहन करने की क्षमता को कम करती हैं। विलासिता पूर्ण या आरामप्रद भौतिक सुविधाएं भी क्षमता को कम करती हैं।

आज किशोरावस्था के बच्चों में भी बढ़ता हुआ तनाव उनमें पैदा होने वाले उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों का कारण है।

तनाव आज के जीवन का अनिवार्य अंग बन गया है, उसको सहन करने के लिये शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्तर पर स्वस्थ व सक्षम होना आवश्यक है। सफल व्यक्ति जीवन के तनावों का सफलता पूर्वक सामना करते हुये लगातार परिश्रम करते हुये सफलता के उच्चस्तर को अर्जित करते हैं तथा तनावों के बीच भी सदैव प्रसन्न रहते हैं।

तनाव के प्रमुख कारण

भय, मनमुटाव, संघर्ष की आशंका, शारीरिक रूग्णता, अनिष्ट न घट जाये इस का भय, कार्याधिक्य, इच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता, पारिवारिक असंतुलन, आजीविका की अनिश्चितता, परीक्षाओं का तनाव असफलता या सफलता के निम्नस्तर की आशंका, इच्छित केरियर, पाठ्यक्रम, कोर्स में प्रवेश में असफलता एवं ऐसे ही अनेक कारण।

तनाव से मुक्ति के उपाय

आधुनिक कठोर व प्रतिस्पर्धापूर्ण जीवनशैली पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य व वैचारिक क्षमता की मांग करती है। पहले शारीरिक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में चर्चा करते है।

शारीरिक स्वास्थ्य व तनाव से मुक्ति

सभी जानते हैं शारीरिक स्वास्थ्य का व्यक्ति की कार्य क्षमता से सीधा सम्बन्ध है तथा स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। अत: यह आवश्यक है कि आज के तनाव पूर्ण जीवन में सफल होने के लिये अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य अर्जित किया जाय।

तनाव का सामना करने के लिये शरीर में लोच या लचीलापन होना अत्यावश्यक है। इसके लिये पौष्टिक व हितकर भोजन तो आवश्यक है ही, साथ ही उचित व्यायाम भी इसकी एक अनिवार्य आवश्यकता है। व्यायाम शरीर की मांसपेशियों व नाड़ियों, रक्त वह शिराओं को मजबूत व लचीला बनाता है।

जितने भी सफल व्यक्ति हैं उनमें से अधिकांश स्वस्थ रहने के लिये नियमित रूप से व्यायाम एवं योग को अपनाते हैं। बड़े-बड़े व्यावसायिक उपक्रमों में आजकल कार्य क्षमता को बढ़ाने के लिये बीच-बीच मे योग की कक्षाएं, कार्य शालाएं आयोजित की जाती हैं। व्यायाम अथवा योग शरीर की गन्दगी को निकालने में शरीर की सहायता करते हैं तथा पोषण भी प्रदान करते हैं। व्यायाम अथवा योग से शरीर में पाचन क्रिया तीव्र होती है। रक्त परिवहन की गति बढ़ जाती है, तेज व गहरे श्वास लेने से अधिक आक्सीजन शरीर को मिलती है जो एक ओर तो शरीर की अशुद्धियों को जला देती है दूसरी ओर भोजन को पचाकर शरीर को पोषण प्रदान करती है। रक्त का तीव्र प्रवाह शारीरिक उर्जा के स्तर को बढ़ा देता है। फलत: व्यायाम करने वाले व्यक्ति अधिक समय तक आत्म विश्वास से पूर्ण एवं युवा अनुभव करते हैं, उनमें बुढ़ापे के लक्षण विलम्ब से प्रकट होते हैं।

विभिन्न उपयोगी व्यायाम

१. सूर्य नमस्कार :- किशोरों व युवाओं के लिये सर्व श्रेष्ठ इसमें दस आसन हैं जो शरीर के सभी अंगो व अन्त:स्त्रावी ग्रंथियों को सक्रिय करते हैं उन्हें सबल व लोचपूर्ण बनाते हैं।

२. प्रात: तीव्र गति से भ्रमण :- इसके लाभों से सभी परिचित है। सभी प्रौढ़ व वृद्ध लोगों के लिये उत्तम/उच्च रक्तचाप व मधुमेह को दूर करने में एक घण्टे का प्रात: भ्रमण सक्षम है।

३. प्राणायाम :- सामान्य गहरे श्वास लेना, कुछ क्षण रोककर धीरे धीरे निकालना। जब चाहे तब कर सकते हैं। प्रात: स्नान के बाद दोनों समय भोजन के बाद व थकान की अवस्था में, चित्त के चंचल होने, एकाग्रता न होने की दशा में भी लाभप्रद। मस्तिष्क की क्षमता व एकाग्रता को बढ़ाने के लिये लाभकारी।

हमारे द्वारा ली गई आक्सीजन का २० प्रतिशत मस्तिष्क के द्वारा ग्रहण किया जाता है। अत: गहरे श्वास लेने से मस्तिष्क को सीधा लाभ होता है, उसे अधिक आक्सीजन मिलती है जो उसकी कार्य क्षमता-सक्रियता को बढ़ा देती है।

४. यौगिक क्रियाएं :- इसका आजकल बहुत जोर है। किसी जानकार व्यक्ति से इन्हें सीखकर लाभ उठाया जा सकता है। सर्वांगासन, अर्धचक्रासन, उत्तानपादासन, ताड़ासन व भुजंगासन सारे शरीर को लाभ पहुचाने वाले आसन हैं।

५. पी. टी. व खेल :- ये शरीर को स्वस्थ व सबल तो बनाते ही हैं मनोरंजक होने से मानसिक स्वास्थ्य में भी वृद्धि करते हैं। खेल व्यक्ति में संगठन, सहयोग व समन्वय, सामाजिकता व सुरक्षा की भावना में वृद्धि करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य व तनाव से मुक्ति

यह सर्व विदित है कि उच्च बौद्धिक क्षमता व मानसिक स्थिरता युक्त व्यक्ति दैनिक जीवन के तनावों का कुशलता पूर्वक सामना करने में सफल होते हैं। ऐसे ही व्यक्ति बाधाओं को दूर करने में, असफलताओं के बीच से सफलता का मार्ग खोजने में सफल होते हैं। ये वे लोग होते है जो असफलताओं से घबराते नहीं है तथा अपनी कमियों को दूर कर आत्म विकास करते हुये सफलता का वरण करते हैं।

यह भी सफल व्यक्तियों के जीवन व कार्यप्रणाली का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोगों का जीवन के प्रति एक विशिष्ट व सकारात्मक दृष्टिकोण होता है तथा ये सैद्धान्तिक तौर पर दृढ़ परन्तु व्यवहार में लचीलापन लिये हुये अपने सहयोगियों को साथ लेकर चलने में व उन्हे इच्छित लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु प्रेरित करने में सक्षम होते हैं। उनका व्यक्ति की अच्छाइयों में विश्वास होता है। ये अल्पकालिक अथवा क्षणिक भावनाओं के वशीभूत नहीं होते, वरन अपनी भावनाओं पर बुद्धि का नियन्त्रण रखने वाले होते हैं।

तनाव मुक्ति में जैन सिद्धान्तो का योगदान

जैन दर्शन के सिद्धान्त जहां वस्तु स्वरूप की अनन्त गुण सम्पन्नता व स्वतन्त्रता की घोषणा करते हैं वहीं अहिंसा, अनेकान्त व अपरिग्रह समाज में सह अस्तित्व, सहानुभूति, सहयोग व मतान्तरों के प्रति भी सम्मान का भाव सुनिश्चित करते हैं। जहां आत्मा की अजरता अमरता का सिद्धान्त व्यक्ति को स्वयं के अनिष्ट की आशंका से मुक्त कर देता है वहीं यह दूसरों का भला या बुरा करने के अहंकार से व्यक्ति को विरक्त भी करता है।

द्रव्य का परिणमन स्वभाव का सिद्धान्त

प्रत्येक द्रव्य का उत्पाद व्यय ध्रुवता युक्त स्वभाव व्यक्ति को विभिन्न पदार्थो में होने वाले नित्य प्रति परिवर्तनों के प्रति निश्चिंत कर देता है, क्योंकि व्यक्ति जानता है कि पदार्थों में होने वाले परिवर्तन अपने समय में अपनी स्वभाव व पर्यायगत विशेषताओं के अनुरूप ही होते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति प्रतिकूल परिणमन होने पर खेद खिन्न नहीं होता परन्तु वस्तु के परिणमन स्वभाव में विश्वास होने से वह यह भी जानता है कि समय आने पर वस्तु में इच्छित परिवर्तन भी होंगे ही। इस प्रकार वह अधीर न होते हुये आशावादी रहता है। व्यक्तियों के प्रतिकूल व्यवहार पर भी वह खेद खिन्न नहीं होता परन्तु वह उनकी अच्छाइयों को उभार कर सही मार्ग पर लाने हेतु सतत् प्रयत्नशील रहता है। उसका व्यक्ति के उत्कृष्ट स्वभाव में विश्वास होने से वह तात्क्षणिक भावावेशों से विचलित नहीं होता तथा अपनी बुद्धि व चिन्तन को लक्ष्य प्रेरित रखते हुये सदैव प्रयत्नशील रहता है। वह प्रतिकूल व्यवहार की दशा में व्यक्ति की अज्ञानताजनित राग-द्वेष प्रेरित व्यवहार की क्षणिकता का विचार कर स्वयं स्थिर चित्त ही रहता है।

जैन दर्शन का पर्याय की क्षणिकता व परिवर्तन शीलता का सिद्धान्त तनाव कम करने की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी है। इस सिद्धान्त को जानने वाला व्यक्ति कभी भी किसी के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रस्त नहीं होता । बुरे से बुरे व्यक्ति भी समय पाकर सुधरते देखे जाते हैं, व्यक्ति समय के साथ सीखता व अपने आपको बदलता है, तीव्र कषाय सदा विद्यमान नहीं रहती, अत: व्यक्ति में सुधार की सम्भावना सदैव ही रहती है। पुराण ऐसी कथाओं से भरे है। अत: जैन दर्शन का यह सिद्धान्त पूर्व में घटित घटनाओं, पूर्व में विद्यमान विकारों, गलतियों, कषायों के भय से व्यक्ति को मुक्त कर बिल्कुल नई शुरूआत करने की प्रेरणा देता है। पूर्वाग्रह से मुक्त होकर किये गये कार्य व्यवहार तनावों को घटाकर सफलता व सद्विश्वास की सम्भावना में वृद्धि करते हैं तथा एक सकारात्मक वातावरण का सृजन करते हैं।

आत्मा की अमरता का सिद्धान्त

उच्च पदो पर कार्य करते हुये तथा सांसारिक जीवन में कई बार अनावश्यक दबावों व धमकियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आत्मा की अमरता व अजरता का विश्वास व्यक्ति को अप्रतिम दृढ़ता प्रदान करता है जिसके कारण व्यक्ति सिद्धान्तों से समझौता नहीं करता वरन् अपने आदर्श मार्ग पर दृढ़ रहता है। वह जानता है कि जीवन में समस्त ही अनुकूल व प्रतिकूल संयोग व आयुष्य पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के उदयानुसार ही होते हैं अन्य कोई किसी का भला बुरा करने की सामर्थ्य नहीं रखता।

कर्म व कर्म फल का सिद्धान्त

जैन दर्शन के अनुसार यह सृष्टि अनादि अनन्त है इसका कोई निर्माता या नियन्ता नहीं है। सभी संसारी जीव अपने कर्मो का फल समय आने पर अनुकूल या प्रतिकूल भोगते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के लिये स्वयं उत्तरदायी होता है, वह जानता है कि वह अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ भावों का फल खुद ही भोगने वाला है। पाप के फल में उसे कोई शरण देने वाला नहीं हैं अत: वह अशुभ कर्मों से यथाशक्ति बचने का प्रयत्न करता है तथा प्रतिकूलताओं में स्वयं कृत कर्मो का ही प्रतिफल जानकर शान्ताचित्त ही रहता है।

अनेकान्त व स्याद्वाद का सिद्धान्त व्यक्ति को अन्य लोगों के मन्तव्य को समझने व अपनी बात को स्पष्टता से समझाने में मदद करता है।

द्रव्य की अनन्तगुणात्मकता का सिद्धान्त, विकार व संयोगों की क्षणिकता का सिद्धान्त

जैन दर्शन के अनुसार आत्मा ज्ञान दर्शन सुखवीर्य आदि अनन्तगुणों का पिण्ड, अन्य समस्त ही परद्रव्यों से भिन्न अखण्ड द्रव्य है तथा रागद्वेषादि व क्रोधादि भाव आत्मा के विकार हैं, जो उसकी अज्ञान जनित अवस्था में उत्पन्न होकर आत्मा को दुखी करते हैं। अत: आत्मा के स्वभाव से परिचित व्यक्ति अन्य के राग-द्वेष प्रेरित कार्यो से विचलित नहीं होता। वह जानता है कि यह व्यक्ति का अज्ञान भाव है अत: वह क्रोध का नहीं दया का पात्र है। साथ ही वह अपने स्वभाव का विचार करता हुआ स्वयं को हिंसा व क्रोधादि भावों से मुक्त रखने में सफल होता हुआ तनाव से मुक्त रहता है। ऐसा व्यक्ति अभावों में संक्लेषित नहीं होता तथा सम्पन्नता में मदान्ध नहीं होता। वह जानता है कि सांसारिक परिग्रह व भोग सामग्री से आत्मा का कुछ भी लाभ नहीं होता है, इनसे प्राप्त सुख वास्तविक सुख नहीं है, अत: वह सांसारिक समृद्धि के लिये पागल नहीं होता। यदि पुण्योदय से उसे आवश्कता से अधिक सामग्री मिलती भी है तो उसका समाज व राष्ट्रहित में उपयोग करने हेतु सदैव तत्पर रहता हैं।

इस प्रकार जैन दर्शन के सिद्धान्त न केवल व्यक्तियों को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी तनाव रहित रखते हैं। वरन् ये व्यक्ति को आत्म-शोधन द्वारा विकास के मार्ग पर अग्रसर होने हेतु प्रेरित करते हैं। इन सिद्धान्तों के अवलम्बन से व्यक्ति तनावों व दबावों का कुशलता पूर्वक सामना कर सकने में समर्थ होता है।

विद्यार्थियों के लिये जैन सिद्धान्तों की उपयोगिता

छात्रों के लिये जैन दर्शन के सिद्धान्त बहुत उपयोगी मार्ग दर्शन व सम्बल प्रदान करने वाले हैं। छात्रों के लिये अध्ययन में उच्च स्तरीय सफलता बहुत ही महत्वपूर्ण होती है वहीं दूसरी ओर असफलता का भय उन्हें घोर आशंकाओं से ग्रस्त कर देता है। उनकी दूसरी बड़ी समस्या महत्वपूर्ण विषयों में अरूचि या निम्नस्तरीय सफलता होती है। अध्ययन में अरूचि एक बड़ी समस्या है जो छात्रों व उनके आभिभावकों के समक्ष संकट खड़ा कर देती है।

जैन दर्शन के अनुसार इस विश्व में जीव ही एक मात्र ज्ञान दर्शन चेतना सम्पन्न द्रव्य है। आचार्यों ने ऐसा कहा है कि आत्मा ज्ञान ही है, ज्ञान का ही बना हुआ है अत: वह ज्ञान के अतिरिक्त और क्या करे? हम अगर गम्भीरता से विचार करें तो जीव वास्तव में ज्ञान ही करता है, ज्ञान के अतिरिक्त अन्य समस्त कार्य तो जगत के पदार्थो में अनकी अपनी परिणमन योग्यता व गुणों के अनुसार स्वत: ही होते रहते हैं, जीवों में ज्ञान भी उनके क्षयोपशम के अनुसार न्यूनाधिक पाया जाता है तथा यह भी आवश्यक नहीं है कि सभी का क्षयोपशम एक सा ही हो या जिसे हम महत्व पूर्ण समझते हैं उस विषय में हमारी बुद्धि चले ही।

अत: छात्रों को प्रथमत: यह समझना चाहिये कि ज्ञानार्जन आत्मा की स्वाभाविक प्रवृति है, अत: उन्हें इच्छित विषयों के अध्ययन में मनोयोग से जुटना चाहिये। दूसरी बात, एक विषय में असफलता का अर्थ जीवन की संभावनाओं का अन्त नहीं है। क्योंकि कई बार व्यक्ति किसी एक विषय में असफल होने पर भी किसी अन्य विषय में बहुत अच्छी उपलब्धि अर्जित करते हैं। अन्ततोगत्वा भवितव्य ही व्यक्ति के जीवन की दिशा व दशा तय करता है।

यहां एक बात और भी ध्यान देने की है कि कई बार व्यक्ति का ज्ञान का क्षयोपशम कम होता है और वह स्वयं को मूर्ख समझने लगता है। लेकिन ज्ञान का क्षयोपशम परिवर्तित भी होता रहता है और भविष्य में बढ़ भी जाता है और तब व्यक्ति, जो पूर्व में अल्पज्ञ था भविष्य में बहुत अच्छी शैक्षिक व बौद्धिक उपलब्धियां अर्जित करने में सफल हो जाता है। विश्व ऐसे अनेकानेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां प्रारम्भ में व्यक्ति किसी विषय या विधा में कमजोर था और बाद में उसी विषय या विधा में उसने श्रेष्ठ अनुकरणीय उपलब्धियां अर्जित की।

अत: छात्रों के लिये आवश्यकता इस बात की है कि वे वर्तमान की अल्प उपलब्धियों से निराश होने के स्थान पर नियमित व मनोयोग पूर्वक अध्ययन करते रहें। सफलता निश्चित ही उनका वरण करेगी।

उचित आहार विहार व तनाव मुक्ति

यह सर्व ज्ञात तथ्य है कि रोग तनाव को बढ़ाते हैं तथा उचित आहार विहार रोग रहित जीवन का एक प्रमुख कारण है।

हम सभी जानते हैं कि उचित आहार व्यक्ति के शरीर व मस्तिष्क के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। जैन शास्त्रों में खाद्य-अखाद्य पदार्थो का विस्तृत विवेचन किया गया है जो समय व आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा सिद्ध हुआ है ।

‘जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन` यह कहावत विश्वप्रसिद्ध है परन्तु यह सदैव ही सत्य नहीं है, परन्तु ‘जैसा खावे अन्न वैसा होवे तन` यह कथन अधिक उपयुक्त है, क्योंकि भोजन के विभिन्न घटक ही शरीर के विभिन्न अवयवों का निर्माण करते हैं। शरीर की तनाव सहन करने की क्षमता की दृष्टि से उचित आहार-विहार महत्वपूर्ण है।

जैन दर्शन में आहार व्यवस्था का बहुत ही वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। उसके मुख्य बिन्दु निम्न प्रकार हैं:-

१. रात्रि भोजन व बिना छना जल :- अत्यधिक हिंसा का कारण होने से निषिद्ध है साथ ही यह स्वास्थ्य के लिये भी अनुकूल नहीं है। आधुनिक चिकित्सक दिन में भोजन करने की तथा पानी छान कर पीने की सलाह देते है। रात्रि भोजन गैस, ऐसेडिटी, अपचन, कब्ज, आमवात व अन्य कई बीमारियों का कारण है। बिना छने जल से आन्त्रशोथ, पीलिया, अतिसार व अन्य अनेक बीमारियां हो जाती है।

२. जमीकंद :- आलू, गाजर, मूली आदि अभक्ष्य पदार्थो में रखे गये है। समस्त ही जमीकंद पौधो की जड़ो का भाग होने से इनमे नाइट्रीफाइंग बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्म जीवों का समूह निवास करता है। इनको लम्बे समय तक रखने पर भी ये अन्य सामान्य वनस्पतियों की तरह खराब नहीं होते तथा इनके विकास मे सूर्य का कोई योगदान नही होने से इन्हें तामसिक भोजन माना गया है। पोषण की दृष्टि से भी इनकी तुलना में भूमि के उपर सूर्य के प्रकाश में विकसित होने वाले फल व सब्जीयां अधिक उपयोगी कहे जाते है। उदाहरण के लिये मूली की जड़ की तुलना में मूली के पत्तों में अधिक पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं।

३. द्विदल :- दूध या दही के साथ, दो समान भाग होने वाले खाद्य-दालों आदि का सेवन अभक्ष्य माना गया है। दूध व दालों का एक साथ सेवन विरूद्ध भोजन माना जाता है। (आयुर्वेद शास्त्रों में)

४. मधु-मद्य व मांस तो प्रत्यक्ष हिंसा जनित उत्पाद होने से निषिद्ध ही हैं। मद्य व मांस के सेवन से होने वाली हानियों के बारे में अनेक अनुसंधान हो चुके हैं। यह सिद्ध हो चुका है कि आज की अनेक धातक बीमारियों का कारण ये पदार्थ हैं।

५. अति भोजन व बिना भूख के भोजन भी शरीर की रोग प्रति रोधक क्षमता को कम करता है तथा उच्च रक्तचाप, हृदय रोग व मधुमेह जैसे घातक रोगों का कारण हैं। (अनिष्ट कारक अभक्ष्य)

६. इसके अतिरिक्त गुटका, पान मसाला, कोल्ड ड्रिंक, फास्टफूड व होटलों का भोजन, संरक्षित खाद्य पदार्थ ये भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हैं, इनमें शरीर को क्षति पहुचाने वाले कई रसायनों का प्रयोग किया जाता है। होटलों में कई दिनों का भोजन भी अनेक स्वाद बढ़ाने वाले रसायनों का उपयोग करके ग्राहकों को परोस दिया जाता हैं। जो अन्ततोगत्वा हानिकारक ही होते हैं, इनमें कई पदार्थ कैंसर पैदा करने में भी कारण बनते हैं।

७. चाकलेट, टाफियां व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा निर्मित मिठाईयां भी अभक्ष्य ही हैं इनमें कई बार पौष्टिकता बढ़ाने हेतु मांस पाउडर भी मिला दिया जाता है अथवा एलकोहल मिलाया जाता है। इनके रेपर पर निकल की परत होती है जिसके कण लगातार सम्पर्क में रहने से चाकलेट, टाफियों आदि पर चिपक जाते हैं। ये निकल के कण शरीर के लिये अत्यधिक घातक होते हैं।

८. एल्यूमिनियम के बर्तनों का रसोई घरों में बहुत प्रयोग किया जाता है लेकिन एल्यूमिनियम खाद्य पदार्थो के रसायनों से क्रियाकर भोजन में मिल जाता है। यह एल्यूमिनियम शरीर में जाने पर मस्तिष्क की कोशिकाओं पर जम जाता है तथा स्मरण शक्ति को कम करता है। अत: इसके प्रयोग से बचना चाहिये। दूध व खट्टी चीजों को तो इन बर्तनों में बनाना ही नहीं चाहिये।

इसके साथ ही आज अनेक कम्पनियों द्वारा नये-नये उत्पाद प्रभावी विज्ञापनों के साथ बाजार में उतारे जा रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रथम तो बाजार की बनी वस्तुओं का सेवन ही नहीं किया जाय, खाद्य पदार्थ घर पर ही बनाकर उनका उपयोग करना ही पूर्णत: सुरक्षित है, अथवा तो उन उत्पादों की गुणवत्ता उनके घटक द्रव्यों की उपयोगिता, शुद्धता आदि की जानकारी के बाद ही उनका उपयोग किया जाय।

जैसा कि उपर पहले ही कहा गया है आहार की पौष्टिकता व सुपाच्यता ही स्वस्थ शरीर का निर्माण में महत्वपूर्ण कारण है। अत: हमें हानिकारक या अनुपयोगी अनावश्यक पदार्थों के सेवन से बचना चाहिये। ऐसे पदार्थ शरीर की रोग प्रति रोधक क्षमता को कम करते हैं तथा बीमारियों का कारण बन कर तनाव उत्पन्न करते हैं। इस तरह ये पदार्थ शरीर की क्षमता का विकास करने के स्थान पर उसमें ट्ठास का कारण बनते हैं।

यह भी एक सर्वज्ञात तथ्य है कि अधिकतर रोगों का कारण आवश्यकता से अधिक व गरिष्ठ भोजन करना है अत: अपनी स्वाद प्रियता पर अंकुश लगाते हुये जीवन के लिये आवश्यक उतना भोजन करना चाहिये। यह याद रखना चाहिये कि भोजन जीवन के लिये है, न कि जीवन भोजन के लिए।

यह भी एक तथ्य है कि शरीर व आत्मा सदैव ही दो भिन्न जड़ व चेतन द्रव्य हैं। शरीर का रूप रंग सौष्ठव आदि नामकर्म के उदयाधीन बदलता रहता है तथा कितना भी प्रयत्न किया जाय एक दिन यह छूट ही जाता है। अत: आत्म हित को ध्यान में रखते हुये अपनी इन्द्रिय विषयों की इच्छा को नियन्त्रित करते हुये उचित मात्रा में प्रशस्त भोज्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिये। हितकर भोजन स्वास्थ्यकर होने से रोग जनित अनेक तनावों से हमें बचाता है। विषय लोलुपता स्वयं तनाव का कारण है और जैसे-जैसे इच्छाओं की पूर्ति की जाती है वे सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती जाती हैं, उनकी पूर्णत: पूर्ति असम्भव है। अत: जड़ व चेतन की भिन्नता, आत्मा की अनन्न गुण सम्पन्नता का विचार कर विषयेच्छा को घटाना ही अचित है।

एक बात और, विषयों की पूर्ति पुण्य के उदय में ही हो सकती है परन्तु विषयों की पूर्ति में मग्न होना व सुख मानना पाप बन्ध का कारण है जिसके फल में कालान्तर में प्रति कूलता व तज्जनित अनन्त कष्टों को भोगना पड़ता है।

जैन साधना के सूत्र व तनाव मुक्ति

जैन दर्शन में चित्त की निर्मलता व एकाग्रता को बढ़ाने के लिये अनेक उपायों की चर्चा की गई है जो न केवल कषायों में कमी लाते हैं वरन् वे चित्त की एकाग्रता व तत्वज्ञान में वृद्धि करके तनाव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इनमें सस्वर पूजन-पाठ-भक्ति-स्वाध्याय-मंत्रजाप व सामायिक आदि कार्य प्रमुख हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि प्रात: नित्य कर्म से निवृत्त होकर किये जाने वाले सस्वर देव पूजन-भक्ति, स्तुति पाठ शरीर में कोलेस्ट्रोल व हानिकारक द्रव्यों की मात्रा में कमी करते हैं। इन क्रियाओं के माध्यम से शरीर में कषायों को बढ़ाने वाले हानिकारक हारमोन्स का स्राव बन्द हो जाता है तथा फेफड़े, हृदय व पाचन तंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि होकर हानिकारक विजातीय तत्वों को शरीर से बाहर निकलने में मदद मिलती है। सस्वर वाचन से तंत्रिका तंत्र व रक्तवह नाड़ियों का लचीलापन बढ़ता है जो शरीर की तनाव सहन करने की क्षमता को बढ़ाता है।

इसके साथ ही ध्यान या सामायिक का तनाव घटाने में महत्वपूर्ण योगदान हैं। ध्यान के लाभों से समस्त ही विश्व आज सुपरिचित है। जैन दर्शन में कहा गया सामायिक ध्यान का ही एक रूप है जिसमें वस्तु स्वरूप का चिन्तन करते हुये बाह्य जगत के विषयों से मन को हटाकर उसे आत्म स्वरूप में एकाग्र करने का अभ्यास किया जाता है। इस क्रिया में चित्त की चंचलता व शरीर की अनेकानेक क्रियाओं में मन्दता आ जाती है, शरीर पूर्णत: शिथिल हो जाता है किन्तु ज्ञान पूर्णत: जाग्रत रहता है। इस ध्यान या सामायिक का प्रभाव शरीर व मन के तनावों को घटाने की दृष्टि से अद्वितीय है, उत्कृष्ट ध्यान को मुक्ति का कारण कहा गया है।

इसके साथ ही भक्ति-पूजा-पाठ-स्तुति, एवं ध्यान-सामायिक उत्कृष्ट शुभ भाव रूप होने से इन क्रियाओं के माध्यम से तीव्र पुण्य का बन्ध होता है जिसके फल में व्यक्ति को समस्त ही प्रकार की जागतिक अनुकूलताएं प्राप्त होती हैं तथा प्रतिकूलताओं की तीव्रता में कमी आ जाती है। इस प्रकार तनाव जनक स्थितियां पैदा ही नहीं होती तथा पैदा होती भी हैं तो व्यक्ति उनका सहज ही समाधान करने में सक्षम हो जाता है।

इसी प्रकार स्वाध्याय भी तनाव को घटाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

तीव्र कषायी व्यक्ति भी यदि स्वाध्याय करता या सुनता है तो उसकी कषाय में शनै: शनै: तत्वज्ञान-वस्तु स्वरूप के यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होने से कमी आने लगती है। वास्तविक वस्तु स्वरूप का ज्ञान होने से व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में तनाव ग्रस्त नहीं होता तथा प्रतिकूलताओं में भी वह समाधान का मार्ग निकाल ही लेता है। कहा भी गया है कि ‘स्वाध्याय: परमं तप:` तथा ज्ञान ही सर्व समाधान कारक है। इस प्रकार स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान तनाव मुक्ति के लिये उत्कृष्ट समाधान प्रस्तुत करता है तथा तनाव रहित जीवन की कला सिखाता है।

सकारात्मक चिन्तन

जैन दर्शन में ऐसा कहा गया है कि जैसी दृष्टि होती है वैसी ही सृष्टि होती है अर्थात हम जैसा सोचते हैं वैसा ही वस्तु या व्यक्ति का व्यवहार होता है। यदि हम किसी व्यक्ति के बारे मे अच्छा विचार करते हैं तो वह भी हमारे सम्बन्ध में अच्छा विचार ही रखता है अथवा कालान्तर में रखने लगेगा। यदि हम किसी का बुरा सोचते है तो वह भी हमारे बारे में बुरा ही सोचता है। आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी यह बात सिद्ध हो चुकी है कि एक व्यक्ति की मानसिक विचार तरंगें दूसरे सम्बन्धित व्यक्ति की भावनाओं को प्रभावित करती है।

तथा जैन दर्शन का कर्म सिद्धान्त भी इस बात की पुष्टि करता है कि सकारात्मक चिन्तन से पाप कर्मो का पुण्यकर्मो में रूपान्तरण हो जाता है तथा व्यक्ति को अनुकूलता व अभीष्ट की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत नकारात्मक चिन्तन से पुण्यकर्मो का पाप कर्मो में रूपान्तरण हो जाता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में अनुकूलताओं की कमी व प्रतिकूलताओं की वृद्धि हो जाती है जो तनाव का प्रमुख कारण है।

अत: किसी भी व्यक्ति के प्रति प्रतिकूल चिन्तन से विराम लेकर सबके प्रति सद्भावना ही रखनी चाहिये। यहां तक कि स्वयं के भविष्य के प्रति भी अनिष्ट की कल्पना कभी नहीं करनी चाहिये, सदैव आशावादी रहना चाहिये, अपने पूर्वकृत पुण्य के फल में विश्वास रखना चाहिये।

वर्तमान में प्रतिकूलता हो तो भी भविष्य के प्रति आशावादी रहते हुये अभीष्ट कार्य हेतु सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये।

और अन्त में सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है प्रमाद रहित जीवन, स्वयं को व्यस्त रखना अथवा समय का सदुपयोग। जैन शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन बहुमूल्य है इसका प्रत्येक समय काम में लिया जाना चाहिये। चारों गतियों व चौरासी लाख योनियों में यह सर्वश्रेष्ठ है। मुक्ति की पूर्ण साधना मनुष्य जीवन में ही संभव है, मुक्ति ही तनाव रहित सर्वोच्च अवस्था है।

लौकिक दृष्टि से देखें तो व्यस्त व्यक्ति कम तनाव ग्रस्त रहते हैं। वे स्वयं को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में लगाये रखते हैं जिससे उन्हें कार्योपरान्त सन्तुष्टि का अनुभव होता है।

समय के प्रत्येक क्षण का अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उपयोग करने से सफलता सुनिश्चित होती है और पश्चाताप का अथवा तनाव का अवसर ही उत्पन्न नहीं होता। जो लोग समय का उपयोग नहीं करते, उचित समय पर उचित कार्य नहीं करते व अभीष्ट उपलब्धि अर्जित करने में असफल रहते हैं, बाद में उनका मन अनेक संकल्प विकल्पों से भर जाता है। कहा भी गया है कि जो समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है अर्थात समय को नष्ट करने वाला व्यक्ति असफल असंतुष्ट जीवन जीते हुये दुर्गति का पात्र बनता है।

अत: समय का सदुपयोग नियमितता व समय पालन आदि गुण न केवल सफलता की गारन्टी देते हैं वरन् तनाव से भी बचाते हैं।

१. भक्ति व ध्यान तनाव घटाते हैं।

२. जीव की शक्ति या तो ज्ञान में लगती है या राग में। ज्ञान में प्रयत्न पूर्वक लगाना पड़ता है लेकिन राग में अनादि संस्कार के कारण शक्ति स्वत: ही लगती है।

मंत्र जाप व तनाव मुक्ति :- ओम (ऊँ)

पांच मिनट तक ओम का जाप करने से केवल दो दिन में छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। पढ़ाई में एकाग्रता और विषय को समझने की क्षमता बढ़ जाती है । योग-विज्ञान के अनुसार प्रतिदिन ३० मिनिट तक शांति से बैठकर लगातार ओम बोलने से ३ माह में स्मरण शक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि एक बार पढ़ने या सुनने से याद हो जाता है।

डा. राजेश कपूर (पंतजली योगपीठ से)

ओम के उच्चारण से नाभि से लेकर मस्तिष्क तक धमनियां सामान्य होने लगती हैं। रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है। ओम का असर नकारा नहीं जा सकता।

(डा. मंजरी त्रिपाठी, एम्स-न्यूरोलोजी विभाग-अध्यक्ष)

ओम से ओटोनोमिक नर्वस सिस्टम पर असर पड़ता है, गति कम हो जाती है, जिससे लोग शान्ति महसूस करने लगते है। एंग्जाइटी, डिप्रेशन व रक्तचाप ठीक हो जाते है।

(डा. अनूप मिश्रा, एम्स- के मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्षद)

‘साइंस` पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में डा. मोर्गन कहते हैं कि ओम के उच्चारण से पेट, सीने और मस्तिष्क में पैदा हुये कम्पन से शरीर की मृत कोशिकाओं को नया जीवन मिलता है और नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। उल्लेखनीय है कि इस जाप से सारे शरीर में संतुलित तरंगो का प्रवाह होने से यह कमाल होता है।

ओम का उच्चारण अलग-अलग आवृतियों में करने से अनेक असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। साइन्स पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार ओम के लगातार जाप से चमत्कारिक प्रभाव होता है यह बन्ध्यत्व में भी लाभ पहुंचाता है तथा सेरीब्रल पाल्सी जैसे असाध्य रोग में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखने मे आये हैं।

विविध मनोदैहिक व्याधियों के उपचार में औंकार मन्त्र की सफलता असंदिग्ध है। असाध्य मानसिक रोगों में भी इस मन्त्र से चमत्कार पूर्ण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। तनाव अवसाद जैसे मनोरोगों से पीड़ित इन्सान के लिये यह मंत्र किसी अमोध औषधि से कम नहीं है। यह न केवल मानसिक शक्ति व शान्ति प्रदान करता है बल्कि इससे स्नायुओं की चंचलता दूर होकर विविध हृदय रोगों, उच्च व निम्न रक्त चाप, मधुमेह जैसे कष्ट साध्य रोगों का उपचार किया जाना संभव हुआ है। औंकार मन्त्र के नियमित जाप से हृदय की शुद्धि होती है मानसिक शक्ति प्रखर होती है।

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