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अपने बल पर स्वराज्य

राजपुत्र जीवंधर कमार ने अपने गुरु से यह जान लिया कि हमारे पिता के  राज्य पर काष्ठंगार अघिकार जमाये बैठा है। अतएव उस राज्य का सच्चा अधिकारी तो मैं ही हूँ। उसी समय से कुमार के मस्तिष्क से यह दिमागी गुलामी समाप्त हो गई  कि मैं किसी के आधीनता में हूँ। उसी दिन से अपने राज्य को प्राप्त करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया।

उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के साथ ही उस विवेकी जीव के दिमाग के यह गुलामी समाप्त हो जाती है कि मैं किसी के आधीन हूँ या कोई मेरे आधीन है। वह तो अपने बल पर अपना स्वराज्य स्थापित करना चाहते है। कहा भी है-स्वतंत्रता जन्म सिद्ध अधिकार हैं।

अपने सहायक आप हो, होगा सहायक जग तभी। बस माँगने से कभी किसी को सुख कभी मिलता नहीं।

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