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सुख की खोज में

गृहस्थ अवस्था में तीर्थंकर मल्लिनाथ की ससुराल को बरात जा रही थी। आकाश मार्ग से इन्द्र अपनी देवों की सेना सहित अकृत्रिम चेैत्यालयों की वन्दनार्थ जा रहा था। कुमार मल्लिनाथ को इन्द्र का वैभव देखकर पूर्वभव की याद आ गई। मैंने पूर्वभव में इन्द्र पद पाकर सागरों पर्यन्त इन्द्रियों के  सम्पूर्ण सुख भोग, किन्तु उनसे कभी तृप्ती नहीं मिली बल्कि निरन्तर तृष्णा और आकुलता ही बढ़ती रह, आज फिर मैं उसी इन्द्रिय विषयों की आग में झुलसने के साधन जुटाने की तैयारी कर रहा हूँ। धिक्कार है मेरी इस अज्ञानता को! इतना सोचकर बरात को वहीं छोड़कर सच्चे सुख की खोज करने जंगल की ओर चल दिये।

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