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सुख शांति के लिये

सिकन्दर जब विजय करने के लिये भारत में आकर सिन्धु नदी के किनारे डेरा डाले पड़ा था। वह अपने गुरु अरस्तू की आज्ञानुसार किसी भारतीय सन्त को अपने देश में ले जाने की खोज में था। एक दिगम्बर साधु को देखकर उसने अपना एक सैनिक मुनि को लाने के लिये भेजा। सैनिक ने मुनि के पास जाकर कहा-’महात्मन्! आपको विश्वविजयी सम्राट सिकन्दर ने बुलाया है।

“एक साधु को तुम्हारे सम्राट से क्या लेना देना है?” सैनिक वापस सिकन्दर के पास पहुँचा और मुनि का सन्देश सुना दिया।

एक साधु की इस प्रकार निर्लोभ्व्रत्ति और निर्भयता देखकर सिकन्दर स्वयं उन मुनि के पास पहुँचा। सिकन्दर ने कहा- “मैं आपकी क्यो सेवा कर सकता हूँ?”

“आप मेरी सेवा क्या करेंगे? पहले अपनी सेवा ही कर लीजिये। प्रत्येक प्राणी अपनी ही सेवा कर सकता है। जो अपनी शुद्ध परणति बनाता है वही अपनी सेवा करता है।” सिकन्दर सब कुछ चुपचाप सुनता रहा।

इसके बाद मुनिराज ने पूछा – “आप भारत में किसके मेहमान बनकर आये हैं?”

“मैं भारत विजय करूँगा।”

“इसके बाद आप कौन सा काम करेंगे?”

“इसके बाद दूसरा देश जीतूंगा।”

“इसके बाद।”

“इसके बाद अपनी राजधानी में शेष जीवन सुख और शांति पूर्वक व्यतीत करूँगा।”

यह सुनकर मुनिराज ने कहा – “यदि आपकी अन्तिम इच्छा यही है तो सुख और शांति से बैठने से आज भी आपको कौन रोक सकता है?” सिकन्दर के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। उसके मन में अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था। “सुख शांति से बैठने के लिए आज भी आपको कौन रोक सकता है?”

सिकन्दर का देवत्व उस पर विजय पाता जा रहा था। उसने मुनि से प्रभावित होकर मुनिराज से कहा-“यदि आप मेरे साथ मेरे देश में चलें तो मैं आज ही वापस चलने को तैयार हूँ”

“इसका उत्तर मेरे गुरु ही दे सकते हैं।”

अपने गुरु से आज्ञा लेकर कल्याण मुनि सिकन्दर के साथ यूनान गये और वहाँ धर्म का महत्त्वपूर्ण प्रचार किया जो इतिहास में अमर है।

आज प्रत्येक प्राणी सिकन्दर का बड़ा भाई बना हुआ है। सुख शांति के लिए वह भी तीन लोक की सम्पत्ति जोड़ना चाहता है। क्योंकि वह बाह्य संयोग में सुख मान रहा है। जबकि संयोग में न सुख है और न दुख है। हाँ संयोगी दृष्टि में अवश्य आकुलता, चिन्ता और अतृप्तिजन्य दुख ही दुख है।

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