एक गाँव के धर्मशाला में दो व्यक्ति आकर ठहर गये। वह धर्मशाला बहुत गन्दी थी क्योंकि उसमें कभी कभी ही यात्री आकर ठहरतें थे। उसमें से एक यात्री धर्मशाला बनवाने वाले को इस गन्दगी के कारण कोसता हुआ गालियाँ बकता रहा। दूसरा व्यक्ति घर से बुहारी माँग कर अपने कमरे को साफ करके आनन्द पूर्वक ठहर गया। धर्मशाला वहीं थी, उसमें रहने वाला एक दुःखी था, एक सुखी था। इस प्रकार मनुष्य दुसरों के अवगुण देखकर उनसे द्वेष कर दुःखी रहता है तो कोई उसे ज्ञेय बनाकर सुखी  रहता है।

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