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स्थितिकरण अंग

पुष्पडाल भगवान महावीर के समोसरण में बैठा था। उसे अनायास अपनी कानी स्त्री की याद आ गई। वह सोचने लगा, मेरे बिना वह दुःखी हो रही होगी। वह उठकर घर की और चल दिया। उसके बालसखा मुनि वारिषेण उसे इस प्रकार जाते देखकर उसकी विकारी भावना को समझ गये । तब वह भी उसके पीछे हो लिये। वारिषेण उसे अपने घर ले गये और अपनी सभी पूर्व पत्नियों को बुलाया। सबने आकर दोनों मुनिराजों को नमस्कार किया। स्वर्ग की अप्सरा जैसी वारिषेंण की 32 रानियों को देखकर पुष्पडाल ने सोचा- इन्होंने जब इनसे सब नाता तोड़ लिया, तब मैं क्यों कानी स्त्री पर मोहित हो कर पुनः संसार के दलदल में फँसना चाहता हूँ। वे दोंनो फिर समोसरण की और चल दिये।

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