Short Stories

आज से मैं ही तेरा बेटा।

बड़े-बड़े नेत्र, चौड़ा ललाट, विशाल भुजाएँ, चौड़ी छाती। सुन्दर-सुगठित शरीर। ऐसे थे महाराज छत्रसाल। प्रजा का हाल-चाल लेने के लिए अकसर वे अकेले घूमते रहते।

एक दिन एक स्त्री उनके सामने आकर बोली – मैं बड़ी दुखिया हूँ।’

’क्या कष्ट है तुम्हें देवी?’ – महाराज ने पूछा।

’आप उस कष्ट को दूर कर सकते हैं? आप वचन दें तो मैं कहूँ।

’सम्भव होगा तो जरूर  तुम्हारा कष्ट दूर करूँगा।’

स्त्री बहुत गिड़गिड़ाकर बोली – ’मेरे कोई सन्तान नहीं है। पति इसमें असमर्थ है। मुझे आपके जैसा ही बेटा चाहिए।’

’छत्रसाल स्तब्ध रह गये। कोई स्त्री उनसे ऐसी बात कहेगी, वे ऐसा सोच भी न सकते थे। पल भर सोचने के बाद वे बोले – ‘तुझे बेटा ही चाहिए न?  ले, आज से मैं ही तेरा बेटा!’ और उसके सामने एक बच्चे की तरह घुटनों के बल बैठ गये।

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