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श्रद्धा के बिना चरित्र

उसकी नाव टूट चुकी थी, उसमें चमकदार सुनहरी कागज चिपका दिया। अन्धा होने से उसने अपनी आँखों पर काला चश्मा भी चढ़ा रखा था। नदी पार कराने को दूसरे नाविक दो रुपया लेते थे। उसने आठ आने में सारी सवारी बैठाली। नदी में एक मील चलने पर नाव का चिपका सारा कागज चला गया। नाव में पानी भरने लगा। तब सब यात्री कहने लगे- क्यों रे! तू क्या अन्धा था, जो मुझे ऐसी नाव में बैठा दिया।

नाविक कहने लगा – मैं सचमुच अन्धा हूँ किन्तु क्या आप लोग भी अन्धे थे जो तुम डेढ़ रुपये के लोभ में मेरी नाव में बैठ गये। तुमने चलना तो कर्त्तव्य समझा किन्तु नाव की परीक्षा भी तो करनी थी। सच्ची श्रद्धा के बिना चलना डूबने का रास्ता ही है।

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