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दिल्ली दूर, शिखरजी सन्मुख

उस समय रेल मोटर का युग नहीं था, पैदल सम्मेदशिखर जी की यात्रा करने के लिए सेठ हरसुखराय जी चलने लगे तो इष्ट मित्रों ने कहा-सेठ सा॰ आपको शिखरजी पहुँचने मे महीनों का समय लगेगा, अतः भगवान् से प्रार्थना है कि आपकी यह तीर्थ यात्रा कुशल मंगल पूर्वक हो। तब सेठ सा॰ कहने लगे-दिल्ली दूर, शिखरजी सन्मुख। याने जब शिखरजी के तरफ मुँह कर लिया है, तब वह अब नजदीक ही है। अब तो दिल्ली दूर है, क्योंकि उसके तरफ पीठ कर ली है। इसी प्रकार जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया, उससे संसार दूर और मोक्ष नजदीक हो गया।

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