Short Stories

शरणागत की रक्षा

भगवान शांतिनाथ अपने पूर्व भव में मेघरथ नाम के राजा थे। एक दिन राजा मेघरथ राजसिंहासन पर बैठे हुए थे। इतने में एक एक शिकारी के डर से उड़ता हुआ एक कबूतर राजा की गोद में आ बैठा। पीछे-पीछे शिकारी भी राजभवन में पहुंचा और राजा से अपनी शिकार की मांग करने लगा।

राजा ने कहा-कबूतर तो मेरी शरण मे आ चुका है, अब उसे नहीं दिया जा सकता। शिकारी बोला-‘राजन्! आप न्यायी राजा होकर भी मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। दूसरे की वस्तु हड़प कर लेना, कहाँ का न्याय है? आप मेरा कबूतर दे दें या फिर उतना माँस कहीं से लाकर दें’।

राजा ने उसके बदले में अपने शरीर का मांस देना स्वीकार कर लिया। एक तराजू के  पलड़े पर कबूतर रखा गया,  दूसरे पलड़े पर राजा ने अपने शरीर का मांस चढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। शरीर का बहुत सा मांस कट जाने पर भी पलड़ा बराबर नहीं हो पा रहा था। उसी समय शिकारी के स्थान पर देव ने प्रकट होकर कहा-‘महाराज! मैं तो आपकी दया की परीक्षा कर रहा था। मुझे क्षमा करें।’ राजा का शरीर पूर्ववत् हो गया।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *