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सेवा निस्वार्थ हो

अफ्रीका मे रंगभेद नीति के विरूद्ध क्रान्ति करने के पश्चात् महात्मा गांधी जब भारत आने लगे तो सब प्रवासी भारतियों ने गांधी जी को बहुमूल्य रत्न आभूषणादि भेंट में दिये। उनमें से एक रत्नहार कस्तूरबा गांधी को दिया। गांधी जी ने कहा-मेरा सेवा का मूल्य चुकाया जा रहा है, जिन्हें मैं लेकर स्वार्थी बन जाऊँगा। इन्हें मैं वापस कर रहा हूँ । कस्तूरबा ने कहा-यह रत्नहार तो मुझे मिला है इस पर आपका अधिकार नहीं है। गांधी जी ने कहा-क्या तुम चाहती हो कि मैं इन सोने चांदी के टुकड़ो पर अपनी सेवा को बेच डालूं । आखिर सभी उपहार वापिस कर दिये गये।

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