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व्यर्थ का अहंकार

बुन्देलखण्ड केशरी महाराज छत्रसाल का जब जन्म हुआ, उसके पूर्व इनके पिता महाराज चम्पतराय के राज्य पर दिल्ली के बादशाह ने आक्रमण कर दिया। बादशाह की सेना ने पन्ना का किला घेर लिया। महाराज चम्पतराय भेष बदल कर किसी तरह अपनी गर्भवती रानी को घोड़े पर बिठाल किले के बाहर एड़ लगा कर भाग निकले। कुछ समय बाद बादशाह की सेना को पता चला। तब उसके सैनिको ने भी राजा का पीछा किया। राजा रानी घोड़े पर बैठे हवा से बात करते हुए भागे जा रहे थे। उसी समय में जंगल में रानी के पेट मे दर्द हुआ और वहीं जंगल में राजकुमार छत्रसाल का जन्म हो गया महाराज चम्पतराय ने सोचा – यदि तत्काल उत्पन्न हुए बालक को लेकर घोड़े पर दौड़ते है तो बालक के प्राणों को खतरा है इसलिए वहीं एक वृक्ष के नीचे बच्चे को सुलाकर राजा रानी घोड़े पर बैठकर भाग निकले क्योकि पीछे दुश्मन के सैनिक जो आ रहे थे। दोनों बहुत दूर निकल गए। दुश्मन के सैनिक को कहीं भी पता नहीं लगा। वे सब वापस लौट आये। सात दिन बाद राजा रानी ने सोचा – अब चलकर बालक को देखना चाहिये। यद्यपि तत्काल के उत्पन्न हुए बालक के जीवन की आशा भी कैसे जा सकती थी फिर भी माता पिता की ममता ने उस जंगल मे बच्चे को देखने की ठान ली। दोनों उस जंगल मे आकर देखते है कि बच्चा सुर्ख हो गया है और हाथ पैर फटकार कर किलकारियाँ भर रहा हैं। पास में जाकर देखा कि वृक्ष पर शहद का छत्ता लगा था, उससे शहद की बूंदे सीधी बच्चे के मुँह मे गिर रही हैं। इसी से राजकुमार लाल होकर आनन्द से खेल रहा था। यहां पूर्वकृत करनी ने ही उसे बचाया और पुष्ट किया। इससे यह निर्णय हुआ कि कोई किसी को न मार सकता, न पाल सकता है और न बचा सकता है। सिर्फ व्यर्थ का अंहकार ही करता है कि मैंने इसको पाला। हाँ अपनी सिर्फ मारने पालने की भावना अवश्य कर सकता है और उसी का फल उसको मिलता है। सुख, दुख, मना, जीना उसकी करनी के अधीन है। क्योंकि मारते हुए भी प्राणी बच जाते हैं और बचाते हुए भी प्राणी मरते देखे जाते हैं।

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