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स्वार्थ भावना

ऋद्धिधारी मुनियों के आहार लेने के कारण भक्तों  के घर रत्नवृष्टि हुई। लालच में  एक बुढ़िया ने भी आहार दिया। शीघ्रता से मुनि महाराज के हाथ पर गरम-गरम खीर रख कर ऊपर देखने लगी कि रत्नवृष्टि अब हुई अब हुई। इधर मुनिराज का हाथ जल गया और वे अन्तराय समझकर चले गये। बुढ़िया ऊपर की ओर मुँह करके रत्नों का इन्तजार ही करती रही। किन्तु एक भी रत्न नहीं बरसा। उसकी समझ में यह तनिक भी नहीं आया कि निःस्वार्थ व स्वार्थ भाव भी कुछ अर्थ रखते हैं।

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