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आत्म संतुष्टि

एक दिन बादशाह नसरुद्दीन शाह शिकार खेलने के लिये निकल पड़े। दिनभर इधर-उधर घूमने के पश्चात् उन्हें एक हिरणी अपने बच्चे के साथ घास चरती नज़र आयी। बादशाह हिरणी के बच्चे की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया। उस पर वार करने के बजाय उसने चुपके से हिरणी के बच्चे को उठा लिया और अपने महल की तरफ चल दिया। बादशाह ने थोड़ी दूर जाने के पश्चात् पीछे मुड़कर देखा कि हिरणी भी उसके पीछे चली आ रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। बादशाह का हृदय, यह दृश्य देख पिघल उठा। उसने हिरणी के बच्चे को छोड़ दिया। हिरणी अपने बच्चे को पाकर खुश हो उठी और उसे चूमने- चाटने लगी। वह बादशाह को तब तक देखती रही जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया। बादशाह ने सोचा हिरणी का वध करने से उसे उतनी आत्म संतुष्टि नहीं हो सकती थी। जितनी संतुष्टि उसे हिरणी के बच्चे को छोड़कर हुई है। उसके पश्चात् बादशाह ने वघ करना छोड़ दिया।

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