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स्वाश्रित जीवन ही श्रेष्ठ है

बापू दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति छोड़ दी, क्योंकि वह पहले ही अपनी सम्पत्ति को सार्वजनिक उपयोग के लिए दान देने का व्रत ले चुके थे। अब तो बापू पूर्ण अकिंचन बन चुके थे।  अब समस्या थी तो गोर्की बहन की और उनकी एक पुत्री थी वह भी बेचारी विधवा थी । दोंनो के उदर पूर्ति के लिए कुछ तो सहायता आवशयक ही थी। उन्होंने बापू को पत्र लिखा- “अब खर्च में वृद्धि हो जाने के कारण उसकी पूर्ति हूतु हमें पडो़सियों का अनाज पीसना पड़ता है यदि आप कोई उपाय बताएं तो बड़ी कृपा हो।” बापू ने तुरन्त ही पत्रोत्तर दिया- “अनाज पीसकर जीविका चलाना हर दृष्टि से अच्छा है। हम भी यहाँ अनाज पीसते है। यदि इच्छा हो तो तुम दोनों यहाँ आ सकती हो हम सब मिलकर एक से रहेंगे। मेरी तरह से जन-सेवा का तुम्हें भी पूर्ण अधिकार है। मुझसे किसी दूसरे प्रबन्ध की आशा करना व्यर्थ होगा। स्वाश्रय ही श्रेष्ठ जीवन है।”

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