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मंगल सूत्र का सौभाग्य

अणहिलपुर (पाटण) नामक प्राचीन नगरी में सेठ जगडू शाह कोट्याधीश रहते थे। उनदिनों लगातार पाँच वर्ष तक अकाल पड़ा था सेठ जगडू ने करोड़ों स्वर्ण मुद्राए खर्च करके देश भर से अनाज खरीदकर दानशालायें एवं भोजनशालायें खुलवा दी। इस प्रकार चार वर्ष तक दानशालायें सानन्द चलती रहीं। पाँचवे वर्ष सेठ के पास धन समाप्त हो गया, तब दानशालायें चलना भी असम्भव हो गया। सेठ उदास बैठे सोच रहे थे कि अब दानशालायें कैसे चलेंगी? इतने में सेठानी सा आ गई। उन्होंने उदासी का कारण पूछा। सैठ जी ने कहा कुछ नहीं यही  सोच रहा हूँ कि अब दानशाला कैसे चालू रखी जाय। सेठानी ने कहा -कई लाख रुपये की कीमत का मेरा मंगल सूत्र बेचकर दानशाला चालू रखिये। सेठ जी ने कहा- तुम्हारे सौभाग्य का चिन्ह मंगल सूत्र कैसे बेच दूँ? सेठानी जी ने उत्तर दिया-हजारों भूखे प्राणियों के पेट में अन्न पहुँचेगा , इससे बड़ा मेरा और सौभाग्य क्या हो सकता है? सेठ जी ने मंगल सूत्र बेचकर दानशाला चालू रखी।

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