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सत्य की तराजू

जाजलि नाम का एक ब्राह्मण था। वह ज्ञान प्राप्त करना चाहता था। ज्ञान की खोज में वह घूमते- घूमते वह एक साधु के पास गया। उस साधु ने उसे एक तुलाधार वैश्य के पास जाने की सलाह दी। ब्राह्मण वहाँ गया। अपनी इच्छा व्यक्ति करते हुए उसने तुलाधार से कहा, “मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए, जिससे मेरा जीवन सुधर जाये।”तुलाधार बोला,’ इस तराजू को देखो। इसकी डंडी हमेशा सीधी रखनी है। न ऊँची न नींची। बस” जाजलि ने देखा कि तराजू की डंडी को सीधा रखने के बाह्य कर्म को करते करते तुलाधार का मन भी सीधा हो गया। उसकी दुकान पर छोटा-बड़ा, धनी निर्धन, जो भी आता था, उसकी तुलना की डंडी सबके लिए एक समान रहती थी। जाजलि को बोध हुआ। हम जो कुछ करते हैं, उसका असर हमारे मन पर पड़ता है। कर्मयोगी को कर्म एक प्रकार का जप होता है। उससे उसकी चित्त-शुद्धि होती है और निर्मल बुद्धि का प्रभाव हमारे कर्म पर पड़ता है।

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