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श्रम तुम्हारा और फल मेरा

संत एकनाथ प्रतिदिन गोदावरी में स्नान के लिए जाया करते थे। वे स्नान करके लौटते तो एक व्यक्ति उन पर थूक देता। वे हंसते और पुनःस्नान कर आते। किन्हीं दुष्ट व्यक्ति ने उससे शर्त लगा रखी थी कि एकनाथ को क्रोधित करना है। एक दिन-दो दिन, एक सप्ताह-दो सप्ताह; और उस व्यक्ति की मेहनत अकारथ जा रही थी। अंततः अंतिम कोशिश की कि आज तो गुस्सा दिलाना ही है। उसने संत एकनाथ पर एक सौ सात बार थूका। एकनाथ हंसते रहे और बार-बार स्नान कर आते फिर उसने एक सौ आठवीं बार भी थूका। एकनाथ हंसे और स्नान कर आए और फिर उसी के पास आकर खड़े हो गये। इस आशा और प्रतीक्षा के साथ कि वह और भी थूकेगा। लेकिन वह गरीब बुरी तरह थक गया था। थूकते-थूकते उसका गला सूख गया था। एकनाथ ने थोड़ी देर शांतिपूर्ण मन से प्रतीक्षा की और फिर बोले-किन शब्दों मे तुम्हारा धन्यवाद दूँ। मैं पहले गोदावरी की गोद का आनन्द दिन में एक बार लेता था फिर तुम्हारी सहायता से में दो बार लेने लगा और आज तो कहना ही क्या, एक सौ आठ बार गोदावरी स्नान का पुण्य मिला। श्रम तुम्हारा और फल मैं ले रहा हूँ।

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