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संसारी की दशा

चन्द्रप्रभु तीर्थंकर अपने पूर्वभव मे एक राजा थे। एक दिन उन्होंने देखा कि सामने तालाब में कमल को देखकर हाथी उसे तोड़ने को उसमें घुस गया और घुसते ही वह कीचड़ में फँस गया। वह ज्यों-ज्यों निकलने की कोशिश करता, वैसे ही और फँसता जाता था, आखिर वह उसमें से न निकल सका और वहीं प्राण देकर मर गया। राजकुमार ने यह दृश्य देखकर विचार किया – यही तो इस संसारी जीव की दशा है कि विषय भोगों में फँसकर अपने कल्याण मार्ग की ओर कभी देखता नहीं है और अपने प्राण गँवा देता है। यह विचारकर वे अपनी आत्मसाधना के लिये दिगम्बर मुनि बनकर वन में चले गये।

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