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संसार की बेड़ी

नारायण नामक एक बालक बचपन से ही संसार से विरक्त सा रहता था। उसका अधिक समय भजन-पूजन, ज्ञान, ध्यान एवं तप में बीतता था। नारायण की मां अपने पुत्र का ब्याह कर पुत्र-वधू का मुंह देखने के लिए उतावली थी। अतः बारह वर्ष की अवस्था में ही उसने पुत्र का ब्याह रचा दिया।

किशोर नारायण बड़ी धूम-धाम और बाजे-गाजे के साथ बारात के साथ रवाना हुआ, तथा विवाह के लिए अपने श्वसुर-गृह के द्वार पर पहुंचा।

जिस समय विवाह-मण्डप में मंगलाष्टक शुरु हुए बा्रह्मणों ने कहा – शुभ मंगल, सावधान! नारायण ने मन ही मन इसका अर्थ लगाया- “संसार की दुखदायिनी बेड़ी तुम्हारे पैरों में पड़ने वाली है अतः सावधान हो जाओ”।

नारायण तत्काल उठकर वहां से भाग गया। वही नारायण वर्षों की कठोर तपस्या के बल पर पहले “रामदास’ कहलाया और फिर ‘समर्थ” बन गया। यही समर्थ रामदास शिवाजी के गुरु थे।

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