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संगति कीजे साधु की

राजग्रही नगरी के राजा श्रेणिक के राज्य मे ऋषभदत्त नाम के श्रेष्ठि रहते थे। श्रेष्ठि पत्नी धारिणी ने गर्भावस्था मे रात्रि स्वप्न में जंबू वृक्ष देखा। जन्म के पश्चात् स्वप्न सूचित पुत्र का नाम रखा – जंबूकुमार। युवावस्था प्राप्त हुए जंबूकुमार पर उसी नगर की आठ श्रेष्ठि कन्यायें अनुरागिनी बनीं। उसी समय सुधर्मा स्वामी नगर के बाहर उद्यान मे पधारे। नगरजन धर्मोपदेश श्रवण करने गये। जंबूकुमार भी गणधर भगवन्त की भोगादिक विषय संबंधी देशना सुन दीक्षा ले मुनि बनने हुतु आतुर हुए। घर आकर माता -पिता से दीक्षा की आज्ञा मांगी। सुनते ही माता-पिता ने कहा- “हे पुत्र! हमारे लिये तू ही सहारा है। तेरे बिना हमारा क्या होगा? अतः तेरे पर रागी आठों कन्याओं से विवाह कर हमारी इच्छा पूर्ण कर।”
जंबूकुमार बोले- “मैं उन्हें प्रतिबोध दे दीक्षित न कर पाऊँ तब तक गृहावस्था में रहूँगा।” ऋषभदत्त ने कन्याओं और उनके पिताओं से सब बाते कहीं। सभी कन्याओं ने जुबूकुमार से कहा कि हम सब ने आपको मन से स्वीकार कर लिया अतः हम अब दूसरों से विवाह नहीं कर सकतीं। आखिर शुभमुहूर्त में आठों कन्याओं के साथ लग्न विधि सम्पन्न हुई। ससुराल से मिली नो करोड़ स्वर्ण मुद्राएं ले घर आये। संध्या समय आठों स्त्रियों को ले प्रतिबोधित करने महल के सातवें खण्ड मे गयें। रात्रि में पांच सौ चोरों के सरदार प्रभव ने तालोद्घाटिनी विद्या द्वारा ऋषभदत्त सेठ के घर के ताले खोल प्रवेश किया और घर के सभी सदस्यो को अवस्थापिनी विद्या द्वारा निद्रधीन किया और चोरी करने हेतु तत्पर हो गया। जंबूकुमार और उनकी पत्नियों ने राग विराग की चर्चा चल रही थी। जंबूकुमार को प्रभव ने समझाने का प्रयत्न किया। जंबूकुमार बोले कि मुझे तेरी शिक्षाओं की कोई आवश्यकता नही क्योंकि प्रातः मैं अपनी नवविवाहिता पत्नियों को प्रतिबोधित कर घर संसार के समस्त भौतिक सुख त्याग कर भगवती दीक्षा ग्रहण करने वाला हूँ। प्रभव सुन कर आश्चर्य से दंग रह गया और बोल – “अहो! समस्त भोग सामग्री उपलब्ध है फिर भी किस हेतु त्यागी बन रहे है?”
जंबुकुमार बोले- “हे प्रभव! भोग सुख किंपाक फल समान अनिष्ट करने वाला है, अतः यह सर्वथा त्याग योग्य ही है।” प्रभव भी प्रतिबोध पाकर पाँच सौ चोरों के साथ संयम पथ की ओर अग्रसर हुआ। सत्संगति का सुफल मिल गया।

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