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सच्ची राह का समय

एक बौद्ध भिक्षुक उपगुप्त था जैसा कि भिक्षुकों का काम भिक्षा मांगना होता है, उसी तरह उपगुप्त भी भिक्षा मांगने के लिए मथुरा नगरी पहुँचा। भिक्षा मांगते-मांगते उसे रात हो गई और वह नगरी की दीवार के पास धूल में लेट गया। रात्रि का समय था चारों और सन्नाटा था, लोगों के दरवाजे बन्द हो चुके थे। और सारी नगरी में अंधकार छाया हुआ था। इतने मे पायल की आवाज सुनाई दी, उसके पैर उपगुप्त के सीने से जा टकराये, वह जाग गया। जागने पर देखा सामने एक नृत्यांगना खड़ी थी, उसके हाथ में एक लेम्प था। उपगुप्त ने उस लैम्प के प्रकाश मे उस युवती के तरफ क्षम्य दृष्टि से देखा। रत्न जड़ित आभूषण तथा पीला नीला तथा झीना वस्त्र धारण किये उस युवती ने उपगुप्त से क्षमा मांगी तथा उसे अपने घर चलने के लिए आमंत्रित किया। वह एक देवदासी थी और उसकी सुन्दरता के दूर-दूर तक चर्चे होते थे। हजारों राजा महाराजा उसे पाने के लिए तरसते थे। जब उस देवदासी ने उपगुप्त की ओर देखा, तो वह क्षम्यदृष्टि से उसकी तरफ देख रहा था। यह देखकर उस देवदासी को आश्चर्य हुआ क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उसकी तरफ भोग्य दृष्टि से देखता था। नृत्यांगना  उस भिक्षुक को घर ले गई ओर अन्दर आने के लिए आग्रह करने लगी परन्तु उपगुप्त ने अंदर जाने से इन्कार कर दिया। तब नृत्यांगना ने कहा-मैं अपने आपको तुम्हें समर्पित करना चाहती हूँ यह सुनकर उपगुप्त के चेहरे पर हल्की स मुस्कराहट छा गई और वह यह कहकर चला गया  कि उपयुक्त समय आने पर वह आयेगा।

कुछ समय पश्चात् उपगुप्त फिर मथुरा नगरी आया। उस समय मथुरा में बसंत का उत्सव मनाया जा रहा था। उत्सव मनाने को लोग वन में गये थे। शांतबस्ती की छाया पर मध्याकाश में पूर्ण चन्द्र का प्रकाश हो रहा था। भिक्षु निज मार्ग पर चला जा रहा थां। नगर के फाटक के पास दीवार की छाया में कौन स्त्री खड़ी थी? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह भयानक रोग से पीड़ि़त थी और उसका शरीर घावों से भरा था। उसे देखकर उपगुप्त ने उसे पहचान लिया और उसे जल पिलाया तथा उपचार किया। स्त्री ने पूछा-दयालु तुम कौन हो? युवा भिक्षुक ने उत्तर दिया-मैं उपगुप्त हूँ और मैंने तुमसे कहा था न, उपयुक्त समय आने पर मैं तुम्हारे पास आऊंगा? आखिर वह उपयुक्त समय आ ही गया। उपगुप्त के कहने का तात्पर्य था कि अगर मैं उस वक्त तुम्हें स्वीकार कर लेता तो तुम्हें लगता कि मैंने तुम्हारे सौन्दर्य पर आसक्त होकर तुम्हें स्वीकार किया है और मैं वह कभी भी नहीं चाहता था उपगुप्त ने उस देवदासी को उस वक्त स्वीकार किया, जब सब लोगों ने उसका त्याग कर दिया था।

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