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धार्मिक सहिष्णुता का प्रभाव

एक बार रुड़की के एक अंग्रेज पादरी ने स्वामी श्रद्धानन्दजी को लिखा- “मैं धर्म प्रचार के लिये हिन्दी सीखना चाहता हूँ। इसके लिये मैं कुछ मास तक गुरुकुल कांगड़ी में रहने की अनुमति चाहता हूँ। आपको वचन देता हूँ कि वहाँ निवास के दौरान ईसाई धर्म का प्रचार बिल्कुल नहीं करुँगा।” कुछ दिन बाद पादरी महोदय को स्वामीजी का उत्तर मिला-“गुरुकुल में आपका स्वागत है और हमारे अतिथि बनकर रहेंगे। परन्तु यह भी वचन दीजिये कि गुरुकुल में आप ईसाई धर्म का प्रचार पूरी तरह करेंगे, जिससे हमारे छात्र महात्मा ईसा मसीह के जीवन तथा धर्म को भी जान सकें। धर्म आपस में बैर करना नहीं, प्रेम करना सिखाता है।” पादरी महोदय गुरुकुल आये तो स्वामीजी ने उनके लिए उचित व्यवस्था कर दी और पूर्ण सम्मान के साथ हिन्दी सीखने की सुविधा प्रदान की। गुरुकुल में उन पर किसी प्रकार का प्रतिबंध भी नहीं था। भारतीय धर्मों के बारे में पादरी महोदय की पूर्व धारणाएं मिट गई और वे स्वामीजी के भक्त बन गए।

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