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मान किसका रहा?

वृषभाचल पर्वत सबसे ऊँचा और दुर्लंघ्य माना जाता था। चक्रवर्ती ही वहाँ जाकर उस पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने और अपना नाम लिखने में सफलता प्राप्त करता था। चिरकाल से कोई चक्रवर्ती नहीं  बना था। इन षट्भूखण्डों पर विजय प्राप्त करके भरत चक्रवर्ती बन रहे थे। पुरातन नियम के अनुसार वृषभाचल के सर्वाेच्च शिखर पर उन्हें अपना नाम अंकित कराना था। दुर्गम यात्रा का सरंजाम जुटाया और चढ़ाई करते-करते सोचने लगे – कैसे सौभाग्यशाली हैं वे, जो इस तरह का कीर्तिमान स्थापित करेंगे। नियत स्थान पर पहुँचे तो स्तब्ध रह गये। उस शिखर पर कोई स्थान ही खाली नहीं था। पूर्ववर्ती चक्रवर्तियों की नामावली से वह शिखर पूरी तरह घिरा हुआ था। भरत का गर्व गल गया और सोचने लगा- इस संसार में न जाने कब-कब क्या-क्या होता रहा है? सर्वाेच्च कहलाने का अहंकार निरर्थक है।

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