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साहित्य से प्रेरणा

केशरिया जी तीर्थक्षेत्र में एक जैन सज्जन ने छह ढाला पुस्तक संत बिनोवाभावे को यह कहकर भेंट में दी कि इसमें जैनधर्म का सार भरा है। संत बिनोवा ने उसे पढ़ा तथा “जल मृतिका बिन और नाहीं कछु गहे अदत्ता।” इस छन्द को पढ़कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की। उन्हें छन्द ने कुछ चिन्तन करने को बाध्य कर दिया कि जल और मिट्टी पर किसी का अधिकार नहीं है। तभी से बिनोवा को भूदानयज्ञ की प्रेरणा मिली। प्रेरक साहित्य के अध्ययन से कभी-कभी जीवन की दिशा बदल जाती है।

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