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प्रेम से ही मनुष्य सुधरता है

विनोबा जी जब छोटे थें और उनके यहाँ उनकी बहन की शादी थी। उसी अवसर पर विनोबा ने अपनी माँ से कहा – मैं विवाह की रसोई नहीं खाऊँगा। यह सुनकर माता रुकमणी देवी ने विवाह कार्य में अत्यन्त व्यस्त रहते हुए भी उन्हें चुपचाप अलग से रसोई बना दी। दूसरी किसी की माँ होती तो डांटती, या मार भी देती, किन्तु रुकमणी देवी ने यह कुछ नहीं किया। भोजन करा देने के बाद माँ ने कहा – विन्या! यदि शादी में मिष्ठान बना होता और तू खाने को मना करता, तब तो ठीक भी था कि मिष्ठान भोजन नुकसान करेगा। किन्तु दाल रोटी न खाने की तेरी हठ पकड़ने का क्या मतलब था? विनोबा ने अपनी हठ की गलती स्वीकार कर अपनी माता से क्षमा माँग ली। ’’प्रेम से ही मनुष्य सुधरता है। “

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