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कल्पनातीत शांति

महाकवि एवं अपने युग के सर्वश्रेष्ठ विचारक रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह महसूस किया था एक दिन उन्होंने नदी को किनारे टहलते समय देखा कि नदी के तेज प्रवाह में एक भयभीत पंछी अपनी सारी शक्ति जुटाकर किनारे लगने की कोशिश कर रहा है। ध्यान से देखने पर पता लगा कि वह एक पालतू मुर्गी थी, और भयाक्रान्त जीवन से मुक्ति पाने को लिए उसने एक छोटी नाव से पानी में छालांग लगा ली थी। प्रवाह से जुझते वह जैसे ही किनारे लग रही थी कि वह उसका पीछा करने वाले निर्दयी हाथों में फंस गयी। गर्दन पकड़कर बड़ी प्रसन्न मुद्रा मे उसे नाव पर वापिस लाया गया। वे यह सब अवाक एकटक ताक रहे थें। घर पहुँचते ही वावर्ची को बुलाकर उन्होंने कहा – “आज से भोजन मे मैं किसी तरह का मांस नहीं लूँगा,”
बावर्ची को आश्चर्य में अवाक् उन्हें देखता रहा, उन्होंने यह मर्मस्पर्शी घटना उसे बतायी और अपना संकल्प दोहराया, इस संकल्प के बाद अपने मन की अवस्था का वर्णन उन्होंने इन दो शब्दोंमें किया है-

“कल्पनातीत शांति”

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