Short Stories

जहाँ परिग्रह है, वहाँ डर ही डर है!

दो साधु जंगल में जा रहे थे। एक गुरु दूसरा उसका चेला। रात्रि का समय था। आगे-आगे गुरु जा रहा था, पीछे-पीछे शिष्य। गुरु के पास कंधे पर एक थेला था। गुरुजी कहते जा रहे थे। “चेला! रात अंधेरी है, रास्ता भयानक है, बड़ा भय है, गांव जल्दी पहुंचना है”

चेला सोच रहा था हम ठहरे साधु और साधु के पास कुछ नहीं होता फिर उनको भय किस बात का हो सकता है? पता नहीं आज गुरुजी  को किस बात का भय हो रहा था। बस एक थोड़ी दूर आगे चलकर एक कुँआ आया। गुरुजी ने थेला चेले को दे दिया और स्वयं मुँह-हाथ धोने लगे। चेले ने थेला खोलके देखा कि उसमें सोने की ईंट थी। चेले को भय का कारण मालूम हो गया। उसने उस सोने की ईंट को कुँए में फेंक कर एक साधारण ईंट रख दी।

गुरुजी हाथ-मुँह धोकर, थेला लेकर आगे चले, कुछ देर बाद ही फिर बोले, ’’चेले! अब गांव पहुँचने की जरूरज नहीं है, यही आराम कर लेते है। अब कोई भय नहीं है।’’ सवेरे उठने पर चेले ने कहा, ’’गुरुजी! आप बड़े त्यागी हैं! आपने ईंट को एक कुँए मे फेंक दिया।’’ गुरुजी ने कहा, जब पत्थर ही दिखाई दे गयी तो उसका त्याग करना नहीं पड़ता। वह अपने आप छूट जाती है। हम लोग पत्थर की महिमा गाते हैं, क्योंकि अभी हमें ईंट सोने की दिखाई दे रही है। जब तक हमें त्यागे हुए पदार्थ की महत्ता नजर आ रही है, तब तक उस किये गए त्याग का अहंकार भी नहीं मिट सकता। असली त्याग तो तब है जब संसार के सारे पदार्थ, दान-धन-वैभव निरर्थक  दिखाई देने लगे तब छोड़ा नहीं जाता, छूट जाता है, निःसार पदार्थ का बोझ कौन ढोयेगा; याद भी नहीं रहता कि कहां छूट गया।

यह तभी सम्भव है कि जब हमें सार वस्तु का ज्ञान हो। अभी तो हमने संसार के वैभव को सार समझकर, तथा जो वस्तुतः सार है हमारा आत्म तत्त्व, उसे असार समझकर भूला रखा है। जब उसमें सार दिखाई दे तो समस्त बाह्य वैभव स्वयं ही छूट जाता है। यदि इस प्रकार आत्मतत्त्व के ग्रहणपूर्वक पर-पदार्थों के निःसार बोझ का त्याग होता है, तब न तो इस बात के विज्ञापन की जरूरत होती है कि पहले इकट्ठा किया हुआ कितना कूड़ा हमने फेंका और न ही उस त्याग की याद रखी जाती है।

कहा भी है – चक्रवर्ती की सम्पदा इन्द्र सारिखे भोग। काक  बीट सम गिनत हैं सम्यग्दृष्टि लोग।

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