Short Stories

जब जागे तभी सवेरा

पात्रकेसरी वेदों के निष्णात प्रतिभाशाली विद्याभिमानी विद्वन थे, जिनके 500 श्ष्यि थे, उनकी राज्य में बड़ी मान प्रतिष्ठा थी। एक दिन संघ्या के पूर्व वे अपने शिष्य समुदाय के साथ पार्शवनाथ मन्दिर के समीप से जा रहे थे। उस मन्दिर में संस्कृत श्लोकों की सुन्दर ध्वनि उनके कर्ण कुहरों में पड़ी। उस आकर्षक कर्णप्रिय ध्वनि को वे ठिठक कर सुनने लगे। धीरे धीरे वह जैन मन्दिर में ही पहुँच गये। वहाँ देखा, तो एक मुनिराज देवागम स्त्रोत का पाठ कर रहे थे। पात्रकेसरी ने पूछा – क्या इसका अर्थ बतला सकते हो? उत्तर मिला, इसका अर्थ आप ही बतलाईये? पात्रकेसरी ने एक बार पूरा पाठ सुनकर ही उसे अपनी स्मरण शक्ति के बल पर याद कर लिया। पश्चात् उसका अर्थ समझाया, जिससे उन्हें जैन धर्म का रहस्य समझ में आ गया। वे अपने 500 शिष्यों सहित दिगम्बर मुनि बन गये। वे अब जैन धर्म के प्रकाण्ड नैयायिक विद्वान् बन गये थे, जिन्होंने शास्त्रार्थ मे दिग्गज विद्वानों को परास्त कर दिया था।

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