Short Stories

अकस्मात् कुछ नहीं

एक दिगम्बर साधु जंगल में रहते थे। एक बार एक राजा साहब उस जंगल में शिकार करने गये। एक बाघ के जोड़े में से बाघ को मार दिया, किन्तु बाघिन बचकर भाग गयी। तब राजा के उसको भी मारने का मन हुआ। वह खूब संभल कर मचान पर बैठ गये। इसी समय मुनिराज राजा के पास गए और उससे कहा कि “तुम बाघिन को मत मारना, वह दुखी है।”

यह कहकर वे वहीं बैठ गये। इतने में बाघिन आई। यह देखकर साहब ने बन्दूक तानी। तब मुनिराज ऊँचे स्वर से चिल्लाये-“तुझे मना किया था न, फिर तू क्यों नही मानता।” राजा रुक गये। बाघिन आई और उनके चारों तरफ चक्कर काटकर वापस चली गई। यह देख साहब को बड़ा आश्चर्य हुआ।

राजा आकर उनसे पूछने लगा- “महाराज! आपको बाघिन ने क्यों नहीं मारा?” मुनि- “मैं किसी को नहीं मारता, तब वह मुझे क्यों मारेगी?”  राजा – “आपको डर नहीं लगता क्या?” “नहीं। जब अकस्मात् कुछ नहीं होता, तब डर कैसा?”

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