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बिना विवेक की क्रिया

दो जैन भाई सागर में वर्णी जी के पास आये, चतुर्दशी का दिन था, इसलिए धर्ममाता चिरोंजाबाई जी ने कहा- आम लोग यहीं भोजन कर लेना। आज यहाँ सचित्त हरी वस्तु तो बनेगी नहीं, दाल रोटी बनेगी सो जीभ लेना। उन्होंने स्वीकृति दे दी। और चुपचाप वे लोग बाजार से दही ले आये और उसे थाली में रख लिया। वर्णी जी ने यह देखकर कहा- भैया, आजकल विवेक  का तो दिवाला ही निकल गया। आप लोग हरी न खाने की बात कहकर यह  बाजार का दही खाओगे, यह तो वही बात हुई कि जैसे कोई कड़वी दवा न खाकर जहर खा लेवें। वे दोनों शर्मिन्दा होकर रह गये।

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