Short Stories

यह नैतिकता !

श्री पं॰ गोपालदास बरैया सन् 1905 में अकलूज निवासी सेठ नाथारंग जी गाँधी के साथ रुई और गल्ले की संजात में दुकान करते थें। सेठ नाथारंग जी ने अपने निवास स्थान अकलूज में एक प्रतिष्ठा तथा बंबई प्रान्तिक सभा के अधिवेशन का आयोजन किया। इस प्रतिष्ठा में बरैया जी को जाना था। अतः उनके एक परम पित्र सूरजचन्द गाँधी ने ढाई सेर देशी शुद्ध शक्कर ले जाकर पं॰ जी से कहा कि आप अकलूज मे हमारे घर पर दे देना। पं॰ जी ने अपना सामान तोलकर देखा तो वह पूरा 15 सेर निकला। उन दिनों एक आदमी रेल मं 15 सेर सामान ही अपने साथ फ्री ले जा सकता था। अतः आपने मित्रता की परवाह न कर उस शक्कर को ले जाने से साफ इन्कार कर दिया कि मैं यह अधिक वजन ले जाकर रेल की चोरी नहीं कर सकता। आपके प्रमाणिक जीवन के अनेक उदाहरणों में से यह एक छोटी सी घटना है।

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