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माता का प्यार

ईश्वरचन्द विद्यासागर में दयालुता के संस्कार उनकी अपनी माता की देन है। इनकी माता का नाम भवती देवी थी। एक दिन एक गरीब महिला अपने बच्चे को छाती से चिपटाये भगवती देवी के पास आकर कहने लगी – माता जी! कोई फटा पुराना कपड़ा हो तो दे दीजिए।’
इन दोनो को ठण्डे से काँपते हुए देखकर भगवती देवी ने अपनी एक मात्र रजाई उठाकर उसे दे दी। यद्यपि घर में एक ही रजाई थी। नई रजाई देखकर वह गरीब महिला सहम गई, किन्तु भगवती जी ने समझाते हुए कहा – बेटी! तू ने जब माता कह कर पुकारा तो माता का प्यार भी तो मुझे देना चाहिये। माता तो बच्चे को सबसे प्यारी वस्तु देती है। यह सुनकर वह महिला कुछ सोचती हुई चली गई।

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