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यह गृहीत मिथ्यात्व है

आचार्य शातिसागर जी का संघ जब सेठ पूनमचन्द घासीलाल ने सम्मेद शिखर जी के लिए निकालने की तैयारी कर ली तो आचार्य श्री के भक्त वृद्ध पंडित जी ने निवेदन किया -महाराज उत्तर प्रान्त की जनता बड़ी वक्र प्रकृति की है, वहाँ कभी मुनियों का विहार हमारे जीवन में नहीं हुआ। कहीं विद्वेषियों  के द्वारा संघ पर संकट न खड़ा हो जाये, अतः उस विघ्न को  दूर करने के लिए किसी देव की आराधना कर कोई मंत्र सिद्ध कर लें, जिससे संकट दूर हो सके। यह सुनकर महाराज श्री ने सुन्दर उत्तर  दिया-पण्डित जी, अभी आपका मिथ्यात्व नहीं गया, जो हमें आगम विरुद्ध सलाह दे रहे हो। महाव्रती साधु क्या किसी अव्रती देव की आराधना कर सकता है? यह तो घोर मिथ्यात्व है।

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