Short Stories

मिथ्यात्व की रस्सी से बंधा जीव

संक्रान्ति के पावन प्रसंग पर प्रयाग में एक मेला था। काशी के कुछ पण्डों ने विचार किया कि हम भी प्रयाग जाकर त्रिवेणी में पाप-ताप को धो डालें। इसी उद्देश्य से सभी पण्डे काशी के घाट पर एकत्र हो गए। शाम का समय था, एक सुन्दर नौका में आरूढ़ हो गया । पण्डितों को भांग बड़ी प्यारी लगती थी, इसलिए बढ़िया भांग घोटी गयी, सभी ने पी और कुछ बर्तनों में भरकर नौका में रख दी। कुछ पण्डे बारी-बारी से चप्पू चला रहे थे। पहले थक जाते तो दूसरे जुट जाते, रात भी बढ़ रही थी, साथ-साथ नशा भी। थकने के बाद पुनः भांग पीते जा रहे थे। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। रात्रि का समय था, नौका विहार यात्रा का आनन्द आ रहा था। सभी गीत गाने में निमग्न थे। रात बीत रही थी, सभी अपनी मस्ती में मस्त थे, पौ फटने लगी, पूर्व दिशा में लाली आ गई, प्रकाश भी फैल गया था। नशा भी कम हो रहा था।

एक ने कहा लगता है कि प्रयागराज आ गया है, देखो-नदी के किनारे सैंकड़ों लोग टहल रहे हैं। दिन भी निकलने वाला है। दूसरा उठकर देखता है, वह कहने लगा कि मुझे तो यह काशी का ही घाट लग रहा है। कहीं हम भूल-भुलईयों में पड़कर पीछे तो नहीं लौटे। बाकी सभी व्यक्ति उनकी बात को सुनकर ठहाका मार कर हँस पड़ें और बोले- लगता है कि इसने भांग अधिक पी ली है, इसलिए इसे प्रयाग भी काशी लग रही है। तीसरा खड़ा हुआ और वह भी कहने लगा, यह तो मुझे भी काशी का ही घाट लग रहा है। चौथा खड़ा होकर आंख फाड़कर देखने लगा और कहने लगा ,मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा है, फिर भी सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता, यह तो काशी का ही घाट है। एक बार पुनः हंसी का फव्वारा गूंज उठा नौका में, सभी कहने लगे रात भर क्या हमने भाड़ झोंका? इतना चप्पू चलाते रहे और वह काशी ही नजर आ रही है। इस प्रकार सभी ने एक-एक करके वही बात दोहराई। सभी को आश्चर्य हुआ। यह क्या? सभी एक साथ खड़ें हुए और चिल्ला उठे। अरे सचमुच काशी का ही घाट है। सब ने सोचा यह कैसे हो गया? रात भर चप्पू चलाते रहे, फिर भी यहां पर ही। जहां से चले थे वहीं पर। यह माजरा क्या है? तब एक बुद्धिमान नीचे उतरकर देखने लगा और कहने लगा-आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है, जिस कील से नाव बंधी थी, वह तो हमने खोली ही नहीं। भांग के नशे मे हम रस्सी खोलना भूल गए हैं, अतः रात भर कठोर परिश्रम करने पर भी हम जहां थे वहीं पर हैं।

मिथ्यात्व का बंधन तोड़े बिना दुख का अंत कहां? भावपाहुड़ की सातवीं गाथा का सार-मुनिव्रत धार अनंतबार ग्रीवक उपजायो। पै निज आत्मज्ञान बिना सुख लेश न पायो।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *