Short Stories

शराबी और मिथ्यात्वी

एक शराबी अपने धुन में चला जा रहा था। उसकी दृष्टि के सामने एक वृक्ष आ गया। उसने जोर से चिल्लाकर वृक्ष से कहा – ओ वृक्ष, सामने से हट जा। किन्तु वह क्यों हटने चला था? उसने दो तीन आवाजें फिर लगाई किन्तु वह वृक्ष सामने से नहीं हटा तो नहीं हटा। तब उसने गुस्से में आकर उसे एक लात लगाई, जिससे उसका स्वयं का मुँह फिर गया। तब वह कहने लगा ‘देखों लातों के देवता बातो से नहीं मानते। लात खाकर आखिर हट गया न सामने से।’ इसी प्रकार मिथ्यादृष्टि जीव भी मानता है कि मैं सबको बदल सकता हूँ। वह भी शराबी की तरह है।

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