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धनि धन्य है जो जीव नरभव पाय यह कारज किया!

एक धनवान सेठ के पुत्र की किसी निर्धन पड़ौसी के लड़के के साथ घनिष्ट मित्रता हो गई। दोनों मि़त्र प्रतिदिन एक दूसरे से मिलते थे और आपस मे बहुत स्नेह रखते थे।  निर्धन का पुत्र यद्यपि सेठ के लड़के के पास नित्यप्रति आता रहता था परन्तु उसके मन मे कुछ संकोच अवश्य बना रहता था। सेठपुत्र इस स्थिति को समझ गया। एक दिन उसने अपने मित्र से कुछ लोहा मँगवाया, जिससे वह अपने धर मे रखी पारसमणि से उसका सोना बना सके और मित्र की निर्धनता दूर कर सके। उसका मित्र लाोहा ले आया तो उसने पिताजीे से पारसमणि माँग कर लोहे को छुआ दिया, परन्तु लोहा वैसा का वैसा लोहा ही बना रहा, सोना नहीं बना। सेठ पुत्र को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा पारसमणि बेकार हो गई, अतः वह दौड़कर पिता जी के पास गया और यह बात सुनाई। सेठ जी ने पुत्र से सब वृतान्त सुनकर कहा-’बेटा1 इस लोहे पर तो जग कीट आदि लगा हुआ है इसलिए पहले इसे दूर करो ,तभी लोहे का स्वर्ण बन सकता है। अबकी बार लड़के ने वैसा ही किया तो लोहा स्वर्णरूप में परिवर्तित हो गया। बस इसी तरह जब तक आत्मा से मिथ्यात्व (उलटी मान्यता) की जंग नहीं छूटेगी तब तक आत्मा परमात्मा नहीं बन सकती। यदि मिथ्यात्व नहीं छूटा और धन परिवार तथा शरीर भी छोड़ दिया तो संसार का दुख नहीं छूट सकता। यदि मिथ्यात्व छूट गया तो और सब अपने आप छूट जायेगा।

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