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मनुष्य भव का मूल्यांकन

भगवान आदिनाथ को नीलांजना की मृत्यु देखकर वैराग्य हो गया। वन मे जाने के लिये तीर्थंकर पालकी में बैठ गये। देवों ने पालकी उठाकर चलना चाहा, तभी मानवो ने कहा-“देवराज! पालकी सबसे पहल हम ले जायेंगे।”
इन्द्र ने कहा- “भाई! क्या बात है? पांचो कल्याणक हम मनाते है, तब आप लोग क्यो नहीं आगे आते हैं, आज आप लोग कैसे रोक रहे हें?”
मनुष्य ने कहा – “देवराज! भगवान हमारी जाति के हैं, इसलिये सबसे पूर्व पालकी उठाने का अधिकार हमारा है। पश्चात् आप कुछ भी करे।”
विद्याधर कहने लगे- “मानवो! हम भी मनुष्य हैं और तुमसे अधिक श्रेष्ठ और विद्याओं के स्वामी हैं, इससे पहले पालकी सबसे पूर्व हम उठायेंगे।”
जब विवाद नहीं सुलझा तो निश्चय हुआ कि जो निर्णय तीर्थंकर के पिता महाराज नाभिराय देंगे, वह सबको स्वीकार होगा। नाभिराय ने निर्णय दिया – भाईयों मेरा विचार है कि भगवान तप करने जा रहे हैं, अतः उनके साथ जो उन जैसा बन सके और तप करने कि शक्ति रखता हो, वही सबसे पहले पालकी उठावें। यह सुनकर मनुष्य खुशी से उछल पड़े, उसी समय सौधर्म इन्द्र कहने लगा- “प्यारे मानवो! आज मेरा सम्पूर्ण वैभव, स्वर्ग का राज्य इन्द्रपद लेकर भी मुझे एक थोड़े समय के लिए अपना मनुष्य पद दे दो, जिससे मैं आज भगवान की पालकी को सबसे पहले उठाने का सौभाग्य तो प्राप्त कर लू ।
“मनुष्यों! तुम महान हो कि इसी भव से चाहो तो भगवान के साथ भगवान भी बन सकते हो।”
अब बताओ – इन्द्र पद बड़ा कि मनुष्य भव श्रेष्ठ है, जो भव आज हमें मिल गया हे। एक इन्द्र तो मनुष्य भव का मूल्यांकन करता है, किन्तु हम?

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