Short Stories

मनोविज्ञान

महाराज भोज सैर को निकले। घोड़ा नया था। इतनी तेजी से दौड़ा कि मंत्रियों से अलग एक जंगल में पहुँच गया। प्यास बहुत लग रही थी, एक बुढ़िया से पानी माँगा। उसने पास के खेत से एक गन्ना तोड़ा, रस से गिलास भर गया। मीठा और ठण्डा रस पीकर राजा ने सोचा इससे इसे बड़ा लाभ होता होगा इस पर कर लगाना चाहिए। वापस में फिर पानी माँगा, तो फिर बुढ़िया एक गन्ना तोड़कर लाई मगर उस में से चौथाई भी रस न निकला। राजा ने कारण पूछा। बुढ़िया ने कहा ऐसा ज्ञात होता है कि हमारे राजा की नीयत में फरक आ गया है! जैसी नीयत वैसी बरकत। राजा बुढ़िया के चरणों पर गिर पड़ा और कहा – माता जी “आप सत्य ही कहती हो। मैं यहाँ का राजा हूँ। वास्तव में मेरी इच्छा गन्ने पर कर लगाने की हो गई थी। अब मैं आप को विश्वास दिलाता हूँ कर नहीं लगाऊँगा।” बुढ़िया अब एक और गन्ना तोड़कर लाई। उसमें पहले से भी ज्यादा रस निकला। देख लिया केवल भावों का चमत्कार।

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