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मन का साँप

कलकत्ता के डा॰ दुर्गाचरण नाग बड़े दयालु पुरुष थे। इनके घर के सामने से मछुए मछली लेकर निकलते तो वें सारी मछलियाँ खरीद कर तालाब में छुड़ा देते। एक दिन उनके बगीचे में साँप निकल आया तो स्त्री ने पुकारा “अजी! जल्दी लाठी लेकर आओ। यहाँ बड़ा भरी काला साँप है।’ नाग सा॰ खाली हाथ ही बगीचे मे पहुँचे पत्नी ने कहा-’ आप लाठी क्यों नहीं लाए। साँप साक्षात् काल है, काल।’ नाग सा॰ कहा- ’जंगल का साँप किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता, यह तो मन का साँप है जो भय और मौत का कारण बना हुआ हैं। जंगल के साँप सब को डसने लगें तो कोई भी जिन्दा बच ही नहीं सकता।’

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