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मैना सुन्दरी

राजा महिपाल ने मैनासुन्दरी को जैन साध्वी के पास अध्ययन करने को भेजा तथा बड़ी पुत्री सुर सुन्दरी को अन्य गुरु के पास भेज दिया। दोनों पुत्रियाँ पढ़कर घर पहुँची। एक दिन राजा ने पुत्रियों को वर पसन्द करने के लिए कहा – सुरसुन्दरी ने अपनी पसन्दगी का वर बतला दिया।

मैना सुन्दरी ने कहा- पिता जी, उच्चपद, संयोग-वियोग भाग्य के अनुसार मिलते हैं। उन्हें खोजने की आवश्यकता ही कहाँ है? यह सुनकर राजा मैना से चिढ़ गया। राजा का विश्वास था कि मेरा किया हुआ सब कुछ होता है। उसने भंयकर कुष्ट रोग से ग्रसित श्रीपाल के साथ मैना का विवाह कर दिया, किन्तु मैना के भाग्य से वही कोढ़ी श्रीपाल भी वैभव सम्पन्न कोटिभट राजा बन गया।

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